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धूल में यूँ बिखड़ जाती है----- गोपाल मिश्र

जब रात काली स्याह बनकर,
 दिन पर यूं छा जाती है.
 तिनका तिनका चुन चुन कर
 स्नेह के धागों से बुनकर,
 हमने बनाए थे जो घरोंदे,
 रिश्ते सारे नाते सारे,
 अपने सारे,  अपने प्यारे,
 रेत की दीवार जैसे,
 यूं ही सब बिखर जाती है,
 जब रात काली स्याह बनकर,
 दिन पर यूं छा जाती ह|

 राह सारे  खो जाते हैं,
 भाग्य भी यूं रूठ जाते हैं,
 सन्नाटा और निराशा बस,
 साथ अपने रह जाते हैं,
 जिजीविषा जो सबसे प्यारी
 पूरी तरह से हार जाती है,
 जब रात काली स्याह बन  कर,
 दिन पर यूं छा जाती है|

 जो बुने थे सुनहरे सपने,
 रंग लगेंगे पीले अपने,
 कैद कब हो जाएंगे सब,
 दूर अपने हो जाएंगे सब
 आश  उमंग के तान सारे,
 धूल में यूं बिखर जाती है,
 जब रात काली स्याह बनकर,
 दिन पर यूं छा  जाती है|

           --- गोपाल मिश्र
ग्राम _ किशुनपुर मिश्रौली   
 थाना - जीरादेई
जनपद - सिवान
बिहार
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10 टिप्पणियाँ
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sriram ने कहा…
धन्यवाद डॉक्टर साहब। प्रणाम
yashoda Agrawal ने कहा…
आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 05 जून 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
बहुत सुन्दर।
पर्यावरण दिवस की बधाई हो।
Ravindra Singh Yadav ने कहा…
जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार (06 जून 2020) को 'पर्यावरण बचाइए, बचे रहेंगे आप' (चर्चा अंक 3724) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
*****
रवीन्द्र सिंह यादव

Alaknanda Singh ने कहा…
राह सारे खो जाते हैं,
भाग्य भी यूं रूठ जाते हैं,
सन्नाटा और निराशा बस,
साथ अपने रह जाते हैं,
जिजीविषा जो सबसे प्यारी
पूरी तरह से हार जाती है,
जब रात काली स्याह बन कर,
दिन पर यूं छा जाती है|... बहुत खूब ल‍िखा गोपाल जी
खूबसूरत रचना।
बधाई सर
अनीता सैनी ने कहा…
जब रात काली स्याह बनकर,
दिन पर यूं छा जाती है.
तिनका तिनका चुन चुन कर
स्नेह के धागों से बुनकर,
हमने बनाए थे जो घरोंदे,
रिश्ते सारे नाते सारे,
अपने सारे, अपने प्यारे,
रेत की दीवार जैसे,
यूं ही सब बिखर जाती है,
जब रात काली स्याह बनकर,
दिन पर यूं छा जाती ह|..बहुत ही खूबसूरत सृजन आदरणीय सर.
सादर
hindiguru ने कहा…
बहुत सुंदर प्रस्तुति