ममुंशी प्रेमचंद महोत्सव, कविता, पिता लौट आते हैं- मृत्युंजय उपाध्याय 'नवल'


कविता:-
                     पिता लौट आते हैं....
                          -------- ------------------------------
                    पिता हर रोज़ आते हैं
                    सूरज की पहली किरण के साथ
                    मेरे उठने के पहले
                    मेरे उजाले के लिए

                    पिता आते हैं
                    तपती धूप में
                    हवा के झोकों के साथ
                    और पोछ जाते हैं
                    मेरे माथे का पसीना
                    
                   आकाश में मंडराते
                   हुंकार भरते आते हैं पिता
                   बादलों के साथ
                   जब पड़ती हैं दरारें 
                   मेरे मन के खेत में
                   बरस जाते हैं बारिश की बूँद में
                   और तर-बतर हो जाता हूँ मै
                    
                   जब खेत मे  लहलहाती है फसल
                   तब पुरवा के रथ पर सवार हो
                   अटखेलियाँ करते आते हैं पिता
                   निहारते हैं खेत को
                   गौरैया के चोंच से 
                   चूम जाते हैं दाने को
                   
                   भाई के बाजार से लौटते ही
                   लौट आते हैं पिता
                   रोज़मर्रा की चीजों के साथ ही
                   
                   पिता हर रोज़ आते हैं
                   माँ की आँखों में 
                   उम्मीद बनकर
       
                     ------मृत्युंजय उपाध्याय 'नवल'
                                                   गोरखपुर
                          मोबाइल-9936338070

47 टिप्‍पणियां

Unknown ने कहा…

बहुत ही अच्छा,

Unknown ने कहा…

Ati sundar rchna

Unknown ने कहा…

Ati sundar rchna

Bajrang Bali Upadhyay ने कहा…

जीवन में पिता के आशीर्वाद और छत्र-छाया के मर्म को इस कविता से समझा जा सकता है। दिल को छू लेने वाली इस कविता के लिए कवि नवल को शुभकामनाएं।

Bajrang Bali Upadhyay ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
Bajrang Bali Upadhyay ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
Unknown ने कहा…

Adbhut kvita

Unknown ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कविता .....

Unknown ने कहा…

नवल जी पिता की छांव का
महत्व बताती है आपकी यह अद्भुत रचना....

Priya Pandey ने कहा…

Wow Jiju very nice! Keep it up

Unknown ने कहा…

Very nice 👍

Unknown ने कहा…

Very nice...👍

Unknown ने कहा…

Awesome Jiju👌👌👌👌👌

Unknown ने कहा…

Masha Allah....I liked

Unknown ने कहा…

One of the Best of Best

Manoj mishra ने कहा…

Awesome

Unknown ने कहा…

Very beautiful lines

Unknown ने कहा…

Very nice sir

पंकज पति त्रिपाठी ने कहा…

बहुत बढ़िया कबिता है नवल भइया
अद्भुत

Unknown ने कहा…

बहुत सुंदर

Unknown ने कहा…

Behtrin

Unknown ने कहा…

Behtareen

Unknown ने कहा…

Behtareen

अनाम ने कहा…

Marmsparshi

Shrvan Kumar Nirala ने कहा…

शानदार पंक्तियां

Shrvan Kumar Nirala ने कहा…

शानदार पंक्तियां

अनाम ने कहा…

Bahut sundar kavita hai

Unknown ने कहा…

Atiii sunder

Lokesh ने कहा…

Great

Unknown ने कहा…

नवलजी,पिता के रूप में नव चेतना आपके जीवन में खुशियों की बहार लाएं और नये तरीके से जीवन जियें।बहुत सुन्दर रचना के लिए बधाई

Unknown ने कहा…

डॉ.विनोद श्रीराम जाधव,महाराष्ट्र

चन्दन कुमार द्विवेदी ने कहा…

पिता से ही इज्जत है, हिम्मत है,सपने हैं।
पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं।।

चन्दन कुमार द्विवेदी ने कहा…

पिता से ही इज्जत है, हिम्मत है,सपने हैं।
पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं।।

बहुत खूब अनुज
हर्दिक बधाई

सुमन सिंह ने कहा…

बहुत अच्छी कविता है
सुख मे दुख में पिता का हाथ सदैव हमारे हाथों को थामे रहता है

s ने कहा…

बहुत सुंदर

Unknown ने कहा…

बहुत बढ़िया कविता...

माता और पिता का स्थान संसार में सर्वोपरी है।

ऐसे ही लिखते रहिये।


Nitin ने कहा…

पिता का होना ऐसा ही है जैसे कड़ी धूप में छत और मूसलाधार बारिश में छतरी। अनुपम रचना।

Unknown ने कहा…

Hard to define but easy to realize how well you decorated spectrum of emotion in your composition for
Immense value of shadow of Father in life.

रवीन्द्र रंगधर ने कहा…

एक पिता के विशाल स्वरूप को व्याख्यायित करती है आपकी कविता ��

Unknown ने कहा…

प्रशंसनीय
👌

Unknown ने कहा…

बहुत ही सुंदर

abhay ने कहा…

Bahut sunder

Brijesh Prajapati ने कहा…

Very nice

Unknown ने कहा…

Great

Vivek upadhyay ने कहा…

Shandar har bar ki tarah is bar bhi aapki kabitaye dil ko chu jati hai ...umeed hai aap aage bhi apne chahne walo ke liye aisi kabitay likhte rahenge

Unknown ने कहा…

अति सुंदर पिता की कविता, पिता वाकई में भगवान है

BAAT KARAMAT ने कहा…

बहुत सुंदर प्रयास.....