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कभी मीरा ,कभी सुकरात ,ने पिया था जिसे हॅसकर,जहर की उस खुमानी को,लेकर साथ आई हूँ_gita

गजल 
×××××

गमों की फिर से एक,
 कहानी लेकर आई हूँ ।
गुजरे वक्त की अपनी,
निशानी लेकर आई हूँ।1।

आग नफरतों की इस,
दुनिया से मिटाने को ,
मैं आज ऑखों में वही,
पानी ले कर के आई हूँ ।2।

मुन्तज़िर हो गयी तेरी,
कायनात में आकर ,
घिरी हूँ अपनों से पर,
लगती मैं पराई हूँ ।3।

जहाँ गायब हुई हमदम,
कभी कश्ती हमारी थी ,
रवानी चन्द मौजों की ,
मैं ले करके आई हूँ।4।

वतन की आबरू लुटती,
बेबस देखती रहती ,
शिकन वाली वो पेशानी,
मैं ले करके आई हूँ।5।

कभी मीरा ,कभी सुकरात ,
ने पिया था जिसे हॅसकर,
जहर की उस खुमानी को,
लेकर साथ आई हूँ।6।

गीता पाण्डेय 'अपराजिता'
उप प्रधानाचार्या
करहियाबाजार ,
रायबरेली ,(उ प्र)
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11 टिप्पणियाँ
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आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 14 दिसंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
Kamini Sinha ने कहा…
सादर नमस्कार ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (15-12-20) को "कुहरा पसरा आज चमन में" (चर्चा अंक 3916) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
--
कामिनी सिन्हा
hindiguru ने कहा…
सुन्दर लेखन
SUJATA PRIYE ने कहा…
बहुत सुंदर
कविता रावत ने कहा…
कभी मीरा ,कभी सुकरात ,
ने पिया था जिसे हॅसकर,
जहर की उस खुमानी को,
लेकर साथ आई हूँ।

अब कहाँ वह मीरा कहाँ सुकरात मिलने वाले जहाँ में

बहुत अच्छी प्रस्तुति
अनीता सैनी ने कहा…
बहुत सुंदर ।
Amrita Tanmay ने कहा…
उम्दा प्रस्तुति ।
कभी मीरा ,कभी सुकरात ,
ने पिया था जिसे हॅसकर,
जहर की उस खुमानी को,
लेकर साथ आई हूँ।6। सुन्दर सृजन।
Jyoti khare ने कहा…
वाह
बहुत सुंदर