काश में सोलह की हो जाती,और वह बीस का हो जाता।बन जाती मैं उसकी नायिका ,और वह मेरा नायक हो जाता_dr Bina Singh

प्रेम पाती
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काश में सोलह की हो जाती
और वह बीस का हो जाता
बन जाती मैं उसकी नायिका
 और वह मेरा नायक हो जाता

 ना हमने कुछ कहा 
ना उसने कुछ सुना
 मधुर सुगंध भाव से
 भर उठा कोना कोना 
ना जाने कैसा था वह आकर्षण 
बेबस हो उठा अंतस से अंतर्मन 
दिल और दिमाग के बीच 
छेड़ा एक जंग 
प्रेम  बेचारा खुद को 
समझाता कभी बहलाता 

आओ फिर से एक बार 
हम दोनों अजनबी बन जाए 
अपराध बोध है या ज्ञान बोध
 सब छोड़ एक दूजे से 
कुछ कह पाए
 अनकहे कुछ शब्द शायद 
मुखरित हो होठों से कहलाता

 सुबह शाम दिन रात की आपाधापी में 
 वक्त गुजरता गया
जो तेल दिया बाती में
 मैं कृष्ण की रुक्मणी राधिका
 बन जाऊं या फिर 
दीवानी मीरा की सी 
साधिका बन जाऊं
 कोमल नाजुक लता जैसे
 मेरा मन शायद सुरभित हो जाता 
जो उस वृक्ष का संबल मिल पाता

डा बीना सिह छत्तीसगढ़

5 टिप्‍पणियां

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर।

Kamini Sinha ने कहा…

सादर नमस्कार ,

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (13-4-21) को "काश में सोलह की हो जाती" (चर्चा अंक 4035) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
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कामिनी सिन्हा

विश्वमोहन ने कहा…

सुंदर!

मन की वीणा ने कहा…

बहुत सुंदर कोमल से उद्गार।

Sunil Raghuvanshi ने कहा…

बहुत सुंदर उदगार