मुझ कुर्सी के खातिर एकदुजे का खून बहाते लोग ।प्रेमशंकर अज्ञानतावश मेंमौत को गले लगाते लोग_premi

मैं एक कुर्सी हूँ
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घर आए मेहमानों का
मै काम हमेशा आती हूँ।
हर महफिल हर सभा में
मैं ही पहले पूछी जाती हूँ।।

दुख मुझे होता है जब कोई
मेरे खातिर लड़ जाता।
हाथ धोकर जब लोभी कोई
मेरे पीछे पड़ जाता।।

मुझे पाने के खातिर हर
किमत  बोली जाती है।
मेरे लिए अक्सर झूठ की
गठरी खोली जाती है।।

दुख होता है जब भी मेरी
खिंचा-तानी होती है।
किधर रहूँ फैसला लेने में
भी परेशानी होती है।।

अलग- अलग जगहों पर 
कई रूपों में पायी जाती हूँ।
नंगी पड़ी रहती तो कहीं
मखमल से सजाई जाती हूँ।।

बड़े घमंडी तोंदूवाले 
मुझपर बैठ इतराते हैं।
निकलता कचुमर मेरा
देख बहुत इठलाते हैं।।

गरीब  घर में खुश होती
पाती बहुत आराम वहाँ।
सफेदपोश पैसेवालों के
घर में मिलता चैन कहाँ।।

मैं एक कुर्सी हूँ,मुझपर
बैठ ,पाते आराम सभी।
हर दफ्तर में मेरी जरूरत
आ जाती मैं काम कभी।।

मुझ कुर्सी के खातिर एक
दुजे का खून बहाते लोग ।
प्रेमशंकर अज्ञानतावश में
मौत को गले लगाते लोग ।।

 कवि-- प्रेमशंकर प्रेमी  (रियासत पवई) औरंगाबाद

1 टिप्पणी

सुषमा सिंह ने कहा…

लाजबाव भाई साब