बैठ आमने-सामने निहारे एक दूजे को, वक्त थम जाए सिर्फ यही चाहता मन_srisahitya

गजल
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  सुरमयी  लोहित  सांझ और अकेला मन,
  सुध नहीं  अपनी  तुझमें  ही  खोया  मन।

  रजनी  पसार  रही  नीरव  चादर  घनेरी,
  गहराती निशा और गूफ्तगू  करता  मन।

  बड़ी   हठीली  होती  हैं  ये  स्मृतियां,
 छायी रहती मन मस्तिष्क मेंमुस्कुराता मन 

  नैनो  के  दर्पण  में  समाए  हुए  तुम,
  झूमे मन का खियांबा बड़ा प्यारा मन।

 आकाश के सिलवटों मेदीखते स्वरुप तुम,
  खुश होता तुझसे  जी भर बतियाता मन।

  बैठ आमने-सामने निहारे एक दूजे को,
  वक्त  थम जाए सिर्फ यही चाहता मन।

 याद आता है मुझको पहला पहला मिलन
 बूंदों के मोती  में  लिपटी मेरा चंचला मन।

         सुषमा सिंह
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(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं मौलिक)

2 टिप्‍पणियां

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (07-04-2021) को  "आओ कोरोना का टीका लगवाएँ"    (चर्चा अंक-4029)  पर भी होगी। 
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मित्रों! कुछ वर्षों से ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। परन्तु प्रसन्नता की बात यह है कि ब्लॉग अब भी लिखे जा रहे हैं और नये ब्लॉगों का सृजन भी हो रहा है।आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके। चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं हो भी नहीं रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत बारह वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है। 
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
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Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

बहुत सुंदर , कोमल भाव, बूंदों की मोती में लिपटा मेरा....
राधे राधे