ये अपने गाँव के चूल्हे,देते हैं संदेश।मिट्टी को न भूलो, चाहे भूलो देश-श्रीराम-रॉय

 कविता

ये अपने गाँव के चूल्हे,देते हैं संदेश।
मिट्टी को न भूलो, चाहे भूलो देश।।

देशी चूल्हे का देशी भोजन, 
रहे सुरक्षित गांव में।
ऑक्सीजन की कमी नहीं, 
पीपल की छाँव में।
हो जल निर्मल ,  
पवन  स्वच्छ जहाँ बहे सदा।
मिट्टी की खुशबू में तैरते 
अपनापन वहाँ रहे सदा।
अपने हाथों मिटा रहे ,
वह गाँव हमारा खो रहा।
शहरों के चकाचौंध में, 
जीवन घुट घुट रो रहा।
बहुत याद आती, 
वह चौपाल गाँव की,
जहाँ मिलते थे,
जीवन जीने के उपदेश।
 मिट्टी को न भूलो, 
चाहे भूलो देश।।

आत्मा से भोजन बनता, 
आत्मा से आते स्वाद।
भौतिकता में डूबे अब, 
शरीर हो रहे बर्बाद।
जिमखाने में जाकर अबतो,
हुई बीमार जवानी।
हृदय की ज्वाला ठंढी न होती,
पीकर ठंढा पानी।
मिल बैठकर खाते सभी 
और गीत खुशी के गाते।
गाँव के चूल्हे जल कर,
 सुख दुःख में साथ निभाते।
गूँगे, बहरे सा जीवन, 
अपनों को छोड़ कर लगता ,
धिक्कार रहा परदेश। 
मिट्टी को न भूलो ,
चाहे भूलो देश।।
@श्रीराम रॉय 9471723852

2 टिप्‍पणियां

Sushma Singh ने कहा…

सशक्त लेखनी 🙏

ARVIND AKELA ने कहा…

वाह,बहुत खूब ।