कंपकंपाते हाथ बढ़े पर , कर सके स्पर्श नहीं...सामने जब नजर उठाया शहर छोड़ जाती रही_Srisahitya

*-:शहर छोड़ जाती रही:-*

और कुछ याद न आया, 
            याद उनकी आती रही।
होंठ चुप नींद न आयी, 
              सांसें संग गाती रही।।

पलको को नीचे गिराकर, 
               सामने जब वो आये।
आँखे उनकी तस्वीर को,
            उनसे ही चुराती रही।।

एक इशारे पर पहुंचे ,
            जब महफिल में उनके।
पास बैठे जो सामने में , 
                धड़कने जाती  रही।।

थरथराने होठों लगे तो,
              दिल न कुछ कह सका।
गहरी सांसों की घड़कन, 
            पलकों पे मुस्काती रही।।

कंपकंपाते हाथ बढ़े पर ,
                कर सके स्पर्श नहीं।
राय जब नजर उठाया, 
             शहर छोड़ जाती रही।।
---श्रीराम रॉय

11 टिप्‍पणियां

ARVIND AKELA ने कहा…

अरे,वाह।
बहुत खूब।

Sushma Singh ने कहा…

अद्भुत 🙏🙏

s ने कहा…

अकेला जी और सुषमा जी का हृदय से आभार

Kamini Sinha ने कहा…

सादर नमस्कार ,

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (24 -5-21) को "अब दया करो प्रभु सृष्टि पर" (चर्चा अंक 4076) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
--
कामिनी सिन्हा

Manisha Goswami ने कहा…

👌👌वाह! बहुत ही बेहतरीन 👌👌👌
हमारे ब्लॉग पर भी आइएगा आपका स्वागत है🙏🙏

Jyoti Dehliwal ने कहा…

बहुत बढ़िया।

SANDEEP KUMAR SHARMA ने कहा…

बहुत खूब

Onkar ने कहा…

बहुत सुंदर

शुभा ने कहा…

वाह!बहुत खूब!

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत ही सुन्दर ...हृदयस्पर्शी...
लाजवाब सृजन।
वाह!!!

Anuradha chauhan ने कहा…

बेहतरीन रचना