पढिये दुःख एक कहानी जिसकी लेखिका हैं श्रीमती सुषमा सिंह_srisahitya

दुःख
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   माटी  का  वह  जीर्ण  शीर्ण  घर   जिसकी दीवारों  में ‌ दरारें  निकल  आयी थीं, जहां तहां  से  मिट्टी  भर-भराकर  गिर
रही थी  और किवाड़  खोलने  पर  चरमर
 की  आवाजें  आती थीं,  खिड़कियां  तो 
मानो  बरसों  से  खुली  ही  ना  थीं । तो 
फिर  आश्चर्य  होता  है  कि  कौन  रहता  होगा  ऐसे  घर  में ।
  
 मैं ‌बताती  हूं ----- बरसों  पहले  यह घर भी  गुलजार  था ।लिपा पुता  चमकता हुआ , दीवारों  पर  फ़ूल  कढे  थे । परी  जैसी  एक  बच्ची पूरे  घर में डोलती  रहती थी । एक तरफ  तुलसी  चौरे पर हर सांझ दीया  झिलमिला उठता था। आंगन  में आम  के  पेड़  पर चिड़ियों का  कईएक 
घोसला और दिन भर चिड़ियों  की  चीं चीं से आंगन  गुलजार  रहता । गांव की सभी 
औरतें  यहीं  ड्योढ़ी ‌मे  बैठकी  लगातीं  उनकी  हंसी ठिठोली  घर आंगन गमगमाता  रहता । पर ना जाने  इस घर को किसकी नजर लग गयी एक ही पल में सब  कुछ समाप्त  हो  गया ।

एक  रोज  अहले  सुबह   इस  घर  से रोने 
पीटने  की  आवाज आने  लगी, सभी अपने  घरों  से  निकलकर नीलू के  घर की  तरफ  दौड़  पड़े। वहां  पहुंचने  के  बाद  सबों  की आंखें  फटी  रह गयी। नीलू के  पापा  यानि  जमना  बाबू आंगन  में  चित  पड़े  थे और मुंह से झाग निकला  हुआ था ,शरीर  का रंग काला  पड़ा  था।
भोर  के  तीन ‌बजे  के करीब  जमना बाबू के  गोसाले से  गायों  के‌  रंभाने  की लगातार  आवाज  आ  रही  थी  आवाज ‌सुनकर  जमना बाबू  की नींद  खुल  गयी
अपना टार्च ‌ उठाया  और  गोसाले  की ओर  बढ़  गये । इनके  जाते  ही  गौवे शान्त  हो  गयी। प्यार  से  इन्होंने गायों को सहलाया  और  ज्यों ही‌  मुडे  कि  एक  पुराना  करैत जो कि  छप्पर  से  लटक  रहा  था इनके  गले पर  जबरदस्त  प्रहार 
किया जमना बाबू की चीख  निकल  गई
और  वहीं  अचेत  होकर  गिर  पड़े। निद्रा में पत्नी चीख ना सुन  सकी । जब  बहुत 
देर  तक  जमना बाबू नहीं  आए तो  पत्नी उठ  उन्हें देखने  गयी,  तब  तक  बहुत 
देर  हो  चुकी  थी, उन्हें  इस ‌हालत  मे‌ देख  रोने  पीटने  लगी।  विपदा  की  इस 
घड़ी  में  नाते रिश्तेदार  आए  तो  लेकिन 
दो चार  दिन  बाद अपने अपने घर  चले गए,‌  पास  पड़ोस वालों  का भी  आना 
 जाना  कम  हो  गया । धीरे धीरे  महीना 
बीत  गया। लेकिन  नीलू  की  मां  इस  
भयंकर  आधात  से  उबर  ना  सकी। बेसुध  बिस्तर  पर  पड़ी  रहती  ना खुद उठती ना  नीलू  की  देखभाल  करती।
छ:  बरस  की  नीलू  भी  मां  के  पास
गुमसुम  पड़ी  रहती, कभी ढूंढ  कर चना चबेना  कुछ  खा  लेती, तो  कभी पड़ोस की  कोई  दयालु  महिला दोनों  को  कुछ
 खिला जाती। लेकिन  सबको  काम  सबकी  अपनी-अपनी  जिम्मेदारी। शनै शनै  सब बिगडता  ही  जा रहा  था।एक दिन अचानक  नीलू  जोर जोर  से  रोने लगी। मां की  चेतना  लौटी  शायद  भूखी  हो ,इतने  दिनों  से‌  ऐसे  ही  तो  है  वात्सल्य  उमड़  आया  किसी  तरह  उठ कर  आयी  बेटी  को प्यार  से  उठाया, लेकिन  यह  क्या, नीलू  का  बदन  तो 
आग की  तरह  तप  रहा  था, बुरी  आशंका  से  मन  कांप  गया  अब  क्या
करे अपनी  देह  में  जान  नहीं,  किसी  का  साथ  नहीं,  पास  में  फूटी  कौड़ी
 नहीं । मां  परेशान  हो  उठी   ग़ौर  से
देखा  तो  नीलू हडि्डयों  का  ढांचा  मात्र
लग  रही  थी।  किससे  कहती  अपनी 
विवशता  पर फफक फफक कर रो पड़ी।
आज  उसे  भूख  महसूस  हो  रही  थी,
किसी  तरह  नीलू  को  सुला  माथे  पर
पानी  का  पट्टी  देकर रसोई  में  गयी  तो
अनाज  के  नाम पर  सिर्फ  चावल  थे 
परेशानहाल  बैठ  गयी  कि  नीलू  की 
धीमी  आवाज  आई   मां  पानी ।  दौड़कर
बेटी  को  पानी  पिलाया  पानी पी  कर नीलू फिर  सो  गयी और  सुप्तावस्था  में 
ही  मां  से  पूछा---- मां  पापा  को  क्या 
हो  गया,  मां  भला  क्या  ज़बाब  देती।
दोनों  मां  बेटी  आंसुओ  से  तर-बतर 
एक  दूसरे  से  चिपटी  हुई  थी। नीलू  का 
बुखार  उतरने  का  नाम  नहीं  ले रहा था।
किसी  तरह  नीलू  की  मां  उठी और चावल  पकाया। दोनो  मां बेटी  महीनों  बाद  आज  भरपेट  भोजन किया  थोडा
अच्छा  लगा । परन्तु  बुखार  का क्या  करें  नीलू  की  मां  परेशान  थी  कि नीलू को  जोर  की  हिचकी  आई , मां  पीठ 
सहलाने  लगी ।नीलू की मां जी जान से
बेटी की सेवासुश्रुषा करने लगी लेकिन नियति  वक्र  हो रही थी तीसरे  दिन नीलू
कुछ  अच्छी लग रही थी खाना भी खायी
किन्तु थोड़े अन्तराल के बाद उसकी तबियत  बिगड़ने  लगी,एक  उल्टी आई
और फिर उसका देह ठंडा होने लगा मां दौड़कर पड़ोस में गई  डाक्टर आया किन्तु स्थिति ज्यों की त्यों रही घंटे भर बाद डाक्टर सफेद चादर ओढ़ा चला गया ।नीलू की मां  गश  खाकर गिर पड़ी।फिर  वही 
सब दुहराया गया ।  लोग बाग आए सांत्वाना  दिए  तत्पश्चात चले गए ।और तब से किसी ने नीलू की मां को भी नहीं
देखा  । अर्धविक्षिप्त वह महिला कभी रोती तो कभी नीलू नीलू चिल्ला उठती है।
दरवाजे कभी नहीं खुलते इस घर  के।
                 सुषमा सिंह
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 (स्वरचित एवं मौलिक)

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