प्रस्तुत करते हैं कृतार्थ पाठक की यह रचना जिंदगी ने आज हमको है बना रक्खा तमाशा_srisahitya

गीत : है बना रक्खा तमाशा

जब खुशी की खोज की तब हाथ आई बस निराशा।
जिंदगी ने आज हमको है बना रक्खा तमाशा।

बेबसी की मार खाकर
मन स्वयं  में घिर रहा है।
दी मुझे आवाज सबने
किंतु तन स्थिर रहा है।

प्यार से आवाज दो तुम बाँध बैठा मन पिपासा।
जिंदगी ने आज हमको है बना रक्खा तमाशा।


तुम परखने पर तुले थे
जब तुम्हारे पास आये।
सिर्फ तुमको छोड़कर हम
और सबको रास आये।

हार थककर लौट आया आज मेरा मन रुआसा।
जिंदगी ने आज हमको है बना रक्खा तमाशा।


नीरनिधि से पूर्ण नदिया
रात दिन कुछ कह रही थी।
सिर्फ सागर से मिलन की
आस लेकर बह रही थी।

किंतु मुझको लौट जाना पड़ रहा है आज प्यासा।
जिंदगी ने आज हमको है बना रक्खा तमाशा।

                              
                          ✍️✍️✍️✍️कृतार्थ पाठक

1 टिप्पणी

राज व्योमकेश ने कहा…

सुंदर