कविता।छल,कपट,प्रपंच से,भरा हुआ यह संसार,यहाँ नहीं भरत सा भाई,नहीं कृष्ण सा यार_akela

कविता 

मतलब की यह दुनियाँ 
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छल,कपट,प्रपंच से,
भरा हुआ यह संसार,
यहाँ नहीं भरत सा भाई,
नहीं कृष्ण सा यार।

मतलब की यह दुनियाँ,
मतलब का घर परिवार,
ऊपर ऊपर मीठी बोली,
दिल में छुरी-कटार।

यहाँ घर घर में मतभेद हैं,
हर के दिलों में अलग छेद है,
ऊपर से दिखता सब ठीक है,
अंदर अंदर जुबानी प्रहार।

यहाँ जात-पात,धर्म प्रबल है,
हर काम में दबंग सफल हैं,
भाईचारा बेबश,लाचार,
कोने में सिसक रहा है  प्यार।

आपस का प्यार गौण है,
सच्चाई असहाय,मौन है,
झुठ का बोलबाला यहाँ पर,
सत्य,इमानदारी की हो रही हार।
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         अरविन्द अकेला

1 टिप्पणी

Sushma Singh ने कहा…

सुंदर रचना 👍