लघुकथा *गंगा स्नान* प्रेरक रचना_sri

लघुकथा
*गंगा स्नान*
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उर्मि ने पवन को झकझोरते कहा कि "शाम हो रही ; अब हमें चलना चाहिए।"  इस पर पवन ने उर्मि के चहरे को चूमते हुये कहा कि "अभी शाम होने में बहुत समय है ।" "नहीं ...अब चलना चाहिए, मम्मी पापा बहुत चिंता करते हैं।... कल तो पापा ने कालेज जाते समय ,जल्दी वापस घर लौट आने की हिदायत भी दिया था।"  उर्मि कहते हुये उठ खड़ी भी नही हो सकी कि उसके ऊपर मानो पहाड़ टूट पड़े।उन दोनों को घेर बहुत से लोग खड़े चिल्ला रहे थे ....."हाँ हाँ यही दोनों हैं, पकड़ो इन्हें,भागने न पाए।"
पंचायत बैठी और फैसला लेने से पूर्व दूर गाँव से पवन के पिता के साथ ही उर्मि के पिता भेरू को घर से बुलाया गया।
पवन के पिता और भेरू ने जब एक दूसरे  को देखा,  तब दोनों ने दौड़ कर एक दूसरे को गले लगाते हुये, एक दूसरे से पूछा "कैसे हो मित्र, वर्षो कहाँ थे?" दोनों को इस प्रकार लिपटते देख पूरा पंचायत  हक्का -बक्का हो गया । 
पवन के पिता ने दोनों हाथ जोड़ भेरू से कहा कि "आपको यदि अच्छा लगे तब दोनों की शादी यहीं सम्पन्न करा दी जाय!" भेरू कुछ बोल नहीं सका । उसने हाथ जोड़ लिये।उसकी आँखों मे आँसू आगये। आज सचमुच उसने गंगा नहा  लिया था।
@ श्रीराम रॉय ,9471723852

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