रामायण पुराणों की ज्ञाता, वीर शिवाजी की माता_sushma

प्रकृति
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   शस्य  श्यामला   धरा,
   रंग   विविध  वसुंधरा,
   झूमते लहराते  शजर,
   निखरी  बहुरंगी छटा।

   श्रृंगारित  रंग   नीलम,
   नीलाभ   नील   गगन,
   उदित अरुण सप्त किरण,
   चहचहाते खग वृंद शकुन।

    श्वेत  धवल   धूसर  अब्र,
    मचलते  बहकते   मगन,
    करे   अठखेलियां   झूमे,
    आसमां  में बादलों  संग।

    इतराती   अवनि    धार,
    किसिम  किसिम  चूनर,
    पीली    बासंती    कभी,
    सावन  हरा - हरा श्रृंगार।

    कलकल  निर्मल  नदियां,
    थिरकती  पांव  पैजनियां,
    मंद  मंद   शीतल   पवन ,
    सौरभ   सुरभित   चमन।

    शैल शिखर उतुंग विशाल,
    चूमते  अम्बर  का आनन,
    प्राणवायु  मकरंद   मलय,
    पल्लवित-पुष्पित  जीवन।

    पुरवाई     की     गुनगुन,
    नभ  नील विस्तृत वितान,
    सर  सरोवर विहंसे कंवल,
    नाना  प्राणी  नर्तन  धाम।
                     सुषमा सिंह
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छत्रपति  शिवाजी
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   शिवनेरी     के    दुर्ग   में,
   शाहजी भोंसले के गृह में,
   जीजा   बाई  के  गर्भ  से,
   रतन अनमोल उदित  हुए ।
   
    रामायण  पुराणों की ज्ञाता,
    वीर  शिवाजी   की   माता,
    लोरियों   में   गुथं   सुनाती,
    उपनिषदों पुराणों की गाथा।

   उन्नत भाल सिंह की चाल,
   नहीं ठोंका सलाम बीजापुर दरबार,
   दादा  कोंडकदेव  को  मिला,
   शिक्षा    दीक्षा   का   भार।

   अठाईस   की  उमर  मात्र,
   चालीस किलों पर जमाई धाक,
   जावली   का   वन   सघन,
   दुष्ट अजमल को किया दो फाड़।

   हिरोजी  और  मदारी  नाथ,
   प्राणपण से दिया था  साथ,
   सर्वज्ञ सर्वश्रेष्ठ का गुमां पाले,
   मुंह की खाया मुगल शर्मशार।

   किए  राष्ट्रहित  बहुतेरे  कार्य,
   यश वैभव मां चरणों में डाल,
   वीर  धीर   सर्वश्रेष्ठ  मिशाल,
   मराठा छत्रपति शिवा महाराज।

   हिन्दुत्व  का  अलख  जगा,
   दिल्ली  तख्त  दिया  हिला,
   काफिरों होश में आओ जरा,
   हिन्दुत्व सूर्य चमकेगा सदा सदा।
   
                       सुषमा सिंह
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( स्वरचित एवं मौलिक)

1 टिप्पणी

ARVIND AKELA ने कहा…

वाह,बहुत सुन्दर रचना।