प्रेमचंद कथा प्रतियोगिता । समझौता


 






प्रेमचंद प्रतियोगिता साहित्य (कहानी)

********


समझौता

########

शिव नाथ पाठक  गांव में रहकर भी अपने बेटे रोहित को अच्छी से अच्छी सच शिक्षा दिलाने का प्रयास कर रहे थे। रोहित कुशाग्र बुद्धि का होनहार छात्र बहुत लगन से उसने बीए सम्मान सहित पास कर लिया। बगल के ही गांव में राज मूर्ति सिंह का परिवार रहता था। परिवार में उनकी पत्नी के अतिरिक्त केवल एक बेटी नीलम रहती थी। गांव में ही उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मैं नीलम और रोहित साथ साथ पढ़े थे।

1 दिन साइकिल से नीलम पढ़ने जा रही थी सामने से एक कार तेजी से आ रही थी रोहित ने देखा अब दुर्घटना होने की संभावना है वह तेजी से दौड़ कर कार के आगे से निकल गया और नीलम की साइकिल को धक्का दे दिया साइकिल कार के नीचे आ गई किंतु नीलम बीच सड़क से 10 हाथ दूर जाकर गिर पड़ी। यही वह क्षण था जिसने नीलम और रोहित हो एक दूसरे के निकट ला दिया। रोहित देखने में गोरा चिट्टा लंबा और सुंदर युवक था नीलम भी थी तो सांवले रंग की किंतु उसकी मुखाकृति इतनी सुंदर की उसे चांद से कम की उपमा नहीं दी जा सकती थी। दोनों ने एक दूसरे को देखा। नीलम ने रोहित का धन्यवाद किया।

"यदि आप ना होते तो आज तो मेरी मृत्यु अवश्य ही हो जाती"। रोहित ने कुछ कहा नहीं, अपने चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लाते हुए इतना ही कहा--" आप बच गई यह मेरा सौभाग्य।"

अब वे दोनों कहीं न कहीं समय निकाल कर एक दूसरे से मिलते रहते। ना जाने आप कब तुम मैं बदल गया और एक छोटी सी घटना ने उनमें परस्पर प्रेम के धागे को जोड़ दिया,। कभी बाजार के शिव मंदिर पर तो कभी मेले में कभी दोनों गांव के बीच पड़ने वाले बड़े से बरगद के नीचे बैठकर ना जाने कहां-कहां की बातें युगल प्रेमी किया करते थे

। आग दोनों और बराबर लगी हुई थी। नीलम ने कहा --"अब हम लोग यहां नहीं मिल सकते हैं क्योंकि हमारे और आपके परिवार के लोग हमें एक साथ देखना नहीं चाहते कहते हैं बहुत बदनामी हो रही है"।

जैसा कि अन्य प्रेमी अपनी सुरक्षा के लिए साथ ही प्यार की निरंतरता और परस्पर सानिध्य बना रहे इसके लिए प्रयासरत रहते हैं ।रोहित और नीलम ने भी सोचा -"क्यों ना हम यहां से कहीं बहुत बहुत दूर चले जाएं।"

        दोनों ने निश्चय किया। "चलो हम लोग क्यों ना मुंबई जैसे महानगर में चले जाएं ।वहां जाकर कुछ भी करेंगे, किसी एक कोने पड़े रहेंगे। किंतु हमें न तो लोगों की बोली ठोली सुनने को मिलेगी और न ही एक दूसरे से अलग रहना पड़ेगा।"बात निश्चित हो गई एक शाम चुपके से दोनों थोड़ा सा अपनी जरूरत का सामान बैग में रखे ।जब दिन ढल गया, दोनों गांव के बीच के बरगद के नीचे इकट्ठे हुए और सहरसा स्टेशन की राह पकड़ लिया। रात 2:00 बजे मुंबई की ट्रेन आई दोनों रोहित और नीलम टिकट लेकर उस पर बैठ गए। तीसरे दिन वे मुंबई पहुंच गए। रोहित का एक पूर्व परिचित मित्र वहां बांद्रा में रहता था ।उसके यहां दोनों एक सप्ताह तक रहे तब तक रोहित ने अपने लिए एक फैक्ट्री में काम खोज लिया और एक छोटा सा आवास भी खोज लिया। नीलम के लिए भी एक होजरी में सिलाई का काम मिल गया दोनों साथ-साथ रहने लगे। जितने पैसे मिलते थे ,उसमें गृहस्थी चल जाती थी ,।कुछ पैसे बच जाते थे।

लगभग साल भर बाद रोहित और नीलम ने अपने बचे हुए बीस हजार रूपयों से एक छोटी सी दुकान ले लिया। और उस पर फल लेकर छोटे व्यापारी के रूप में कार्य शुरू कर दिया। रोहित मृदुभाषी था ।आसपास के क्षेत्र के लोग प्राय उसी की दुकान से फल और हरी सब्जियां ले लिया करते थे। इन दोनों ही धंधे में बहुत लाभ होता था। कुछ दिन उन्होंने काम करने के बाद, अपनी स्वयं की एक खोली बना ली और आराम से रहने लगे।

     शिव नाथ पाठक बेटे की चिंता में दुबले हुए जा रहे थे ।तभी एक दिन उन्हें बेटे का फोन मिला ।उसने पिता को प्रणाम किया। और कहा --"हम लोग कुशल से हैं ।अब आप एक बच्चे के बाबा हो गए। मैं मुंबई में फल की दुकान करता हूं। अपना निजी घर हो गया है। आप चाहे तो आशीर्वाद देने के लिए आ सकते हैं। कब आएंगे ?बता दीजिए मैं ट्रेन की टिकट भेज दूंगा"। शिवनाथ पाठक ने सोचा-" अच्छा है गड़े मुर्दे उखाड़ने की वजह अब जो हुआ, उसी को स्वीकार कर लिया जाए। व्यर्थ ही मन में क्रोध और गिलानी को स्थान देकर कोई फायदा नहीं है ।"उन्होंने राम सुमेर सिंह को भी बता दिया। अगर चलना हो तो,, हम तुम दोनों बचपन के मित्र रहे हैं, आओ चलो एक स्थान पर घूम आया जाए।

कानू खान किसी को खबर नहीं भी शिव नाथ पाठक और राम सुमेर सिंह मुंबई चले गए ,जाकर देखा। रोहित और नीलम की गृहस्थी बड़े सुख से चल रही है। छोटे से पोते को शिवनाथ ने गोद में लिया। बहुत सुंदर चेहरा राम सुमेर सिंह ने भी भाग्य का खेल मानकर सब कुछ स्वीकार कर लिया था। बेटी को छोड़ भी देते तो उनका अपना कौन था? और अब आज के जमाने में कौन ब्राह्मण ठाकुर देखता है?

दोनों ने बच्चे को आशीर्वाद दिया। शिव नाथ पाठक ने रोहित और नीलम को बेटे और बहू के रूप में स्वीकार कर लिया। सुमेर सिंह के पीछे नहीं रहे उन्होंने दोनों को आशीर्वाद दिया--"सुख ,से रहो समय उचित आएगा, गांव चले आना कभी-कभी हम बूढ़े लोगों को देखने के लिए।"

रोहित और नीलम ने भी स्वीकार कर लिया। तारबंदी रहने के बाद शिव नाथ पाठक और राम सुमेर सिंह गांव लौट आए। छोटी सी बात गांव में बहुत जल्दी फैल जाती है। लोगों ने तरह-तरह से अपनी अपनी प्रतिक्रिया दी ।किसी ने व्यंग्य किया।  किसी किसी ने इसे प्रेम का नाम दिया किंतु इसके आगे और हो क्या सकता था। उस दिन बाद ,सब कुछ हो वैसे ही सामान्य हो गया जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो। साल बाद रोहित और नीलम गांव पर आए। दोनों परिवार एक दूसरे को देख कर प्रसन्न थे कुछ दिन रहने के बाद रोहित और नीलम अपने बेटे अभय के साथ मुंबई लौट आए। व्यापार धीरे धीरे बहुत बढ़ गया दो नौकरों के साथ रोहित दुकान संभालता था। नीलम घर संभालती थी। बेटा अभयब.बी. ए. पास कर चुका था। पिता के काम में हाथ बताने लगा और सभी सुख पूर्वक रहने लगे।

---------

डॉ ब्रजेन्द्र नारायण द्विवेद्वी शैलेश 

वाराणसी 94586712


1 टिप्पणी

ARVIND AKELA ने कहा…

वाह,बहुत अच्छे।