hindi story | प्रेमचंद कथा प्रतियोगिता ।गरीबी ।शाहाना परवीन_saahitya

 प्रतियोगिता 

लघुकथा "सही फैसला"
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आज तुषार बहुत खुश था। उसे विधालय में बेस्ट टीचर का अवार्ड जो मिला था। उसे स्टेज पर बुलाया गया और उससे पूछा गया कि आपने इतने कम समय में बेस्ट टीचर का अवार्ड प्राप्त किया है । अपनी इस महान उपलब्धि के विषय में कुछ बताइये?
तुषार माइक के सामने खड़ा था और उसकी आँखे नम थीं। उसने बताया मेरे इस अवार्ड में मेरे माता पिता के अतिरिक्त एक ओर चीज़ शामिल है वह है "समय पर सही निर्णय"।
तुषार से पत्रकारों व अन्य शिक्षको ने पूछा कि बताइये कैसे ? तुषार ने कहना आरम्भ किया।
हमेशा की तरह उस वर्ष भी बाहरवीं में तुषार के बहुत अच्छे अंक आये थे। तुषार इंजीनियर बनना चाहता था। परन्तु घर के हालात इतने अच्छे नहीं थे कि वह फीस भर सके।
पिता ऑटो चलाते थे। माँ घर में रहती थी और तीन बच्चे और थे, उन्हें संभालती थी।
तुषार को पता था कि इंजीनियरिंग करने के लिए काफी रुपयों की ज़रुरत पड़ती है। पर उसे तो इंजीनियरिंग ही करने की धुन सवार थी। वह 
हट कर रहा था। उसकी जि़द को देखते हुए तुषार के पिता दीन दयाल ने तुषार की सहायता करने की बात कही और एक दो लोगों से पैसा उधार देने का आग्रह किया । पर किसी ने एक रुपये की भी सहायता नहीं की।
तुषार के पिता दीन दयाल जी दफ्तर के एक बाबू को लाने- ले जाने का काम किया करते थे। एक दिन बाबू के तुषार के विषय में पूछने के बाद दीन दयाल ने बाबू को सब कुछ बता दिया कि पैसा ना होने के कारण तुषार के इंजीनियर बनने का सपना अधूरा रह जायेगा। 
बाबू ने दीन दयाल को शाम को अपने घर बुलाया। दीन दयाल शाम को बाबू के पास गये । बाबू ने कहा कि ,"ऐसा करो मैनें अपने एक मित्र से पैसों की बात कर ली है पर उसकी एक शर्त है।" दीन दयाल के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ पड़ी। परन्तु दो ही क्षण में खुशी की लकीर फीकी पड़ गई क्योकिं शर्त थी ऑटो बेच दो या उसके पास सिक्योरिटी के तौर पर रख दो। जब पैसे आयेगें अपना ऑटो ले जाना। 
दीन दयाल के पास एकमात्र ऑटो ही था जिससे वह अपना और परिवार का पेट पाल रहा था। तुषार को भी यह बात पता चली पर उसने अधिक ध्यान नहीं दिया और बोला वह कुछ नहीं जानता उसे इंजीनियरिंग करने के लिए केवल पैसे चाहिए।
दीन दयाल ने काफी सोच विचारने के बाद ऑटो बेचने की तैयारी कर ली। दीनदयाल तुषार को साथ में लेकर बाबू के घर जाने के लिए ऑटो में बैठ गया। तुषार ने देखा कि उसके पिता अपने ऑटो से बहुत प्यार करते थे। उसे भीड़ से बचाकर चलाते थे। सवारियों का सम्मान करना उचित पैसे लेना उनके व्यवहार में शामिल था। खैर, बाबू का घर आ गया और तुषार अपने पिता के साथ ऑटो बेचने वहाँ पहुंचा। दीनदयाल से बाबू ने ऑटो की चाबी मांगी। दीन दयाल ने जेब से निकालकर चाबी जैसे ही बाबू की तरफ बढ़ाई। वैसे ही तुषार ने वह चाबी खुद अपने हाथों में ले ली और बोला ..."हमारा ऑटो नहीं बिकेगा।" 
घर लौटकर तुषार ने कहा कि वह कोई भी ऐसी पढ़ाई करके खुश नहीं हो पायेगा। जो उसके पिता कि आँखो में आँसू ले आये। उसने अपने पिता के साथ मिलकर ऑटो चलाना शुरू किया। अब वह एक शिक्षक बनना चाहता था। उसने उसी के लिए दाखिला लेकर अपनी पढ़ाई जारी रखी । सुबह कॉलेज जाता था और शाम को ऑटो चलाता था। इससे दीन दयाल को भी लाभ हो गया और तुषार भी अपनी मेहनत के पैसों से कुछ ही वर्षों में एक निपुर्ण शिक्षक बन गया। इसके लिए उसे ना किसी से पैसे उधार लेने पड़े, ना ही किसी को रिश्वर देनी पड़ी।
तुषार को स्कूल में नौकरी मिल गयी। वह नौकरी तो करता ही था, गरीब बस्ती के  बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा भी देता था। वह कहता था कि शायद इसी में से कोई बच्चा कल अपने सपनों को पूरा करने में सफल हो जाए। 
तुषार के इसी सेवा भाव और अपने स्कूल में शत फीसदी परिणाम देने पर उसे इस वर्ष बेस्ट शिक्षक का पुरस्कार दिया गया। तुषार ने स्टेज पर अपने माता पिता को बुलाकर उनका आशीर्वाद लिया और वहाँ उपस्थित सभी छात्रों से कहा-" जीवन में कभी भी गलत फैसला मत लेना। सोच विचारकर लिया गया फैसला ही आपको सफल बनाता है। सुख की अनूभूति देता है।।
पूरा ग्राऊंड तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

शाहाना परवीन...✍️
पटियाला पंजाब

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