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प्रेमचंद कथा महोत्सव में गीतापाण्डेय की लघुकथा_palolife

लघुकथा -उर्मि
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छोटी सी बच्ची उर्मि नयी नवेली दुल्हन के वेश मे, देवी का रूप लग रही थी! 
सांवली सी सूरत,  उज्ज्वल दंत पंक्तितिया , उस घास फूस के बने घर मे कभी इधर कभी उधर दौड लगा रही थी! 
उसकी पायल की रूनझुन उस मिट्टी के घर मे, रौनक फैला रही थी! सास श्यामा पत्थर पर मासाला पीसते हुए भाव विभोर हो उसे ही देखे जा रही थी! 
उर्मि के रूप में उसे बेटी मिली थी! तेजू ने कदम रखा ही था! कि वो नन्ही सी बच्ची, दौडकर सास श्यामा की गर्दन पर बाहें डाल चिपक गयी! तेजू को ये बात नागवार लगी, की लडकी मेरी माँ को क्यू अपनी माँ समझ रही है'  बालमन की निष्ठुरता दौडकर उर्मि की चोटी पकड ली, और खींच कर माँ से दूर कर दिया, दर्द से तड़प उठी उर्मि, माँ श्यामा को कुछ ना सूझा तो चूल्हे मे जल रही लकडी उठा कर डराने के उद्देश्य से बेटे की ओर दौडी, और फिसल गयी, कुछ ही देर मे आंखों के सामने अंधेरा छा गया! 
जब होश आया,सारा परिवार सामने था! सिवाय तेजू के, माँ की ममता तडप उठी, पति से आंखों ही आंखों मे तेजू के बारे मे जानकारी चाही, पति बाहर चले गये कुछ देर बाद आये तो बेटा साथ मे था  डरा सहमा, माँ ने इशारे से पास बुलाया, बेटे को छोड़ सबको बाहर जाने का इशारा किया, 
उर्मि जाने के लिए उठी तो, उसे रोक लिया, तेजू माँ के गले लग सिसकने लगा, चुप हो जा श्यामा ने समझाया , अच्छा उर्मि को क्यू प्रताड़ित किया, 
वो आपसे दिन भर चिपकी रहती हैं! 
भूतनी जैसी, उर्मि आंखे फाडे तेजू को देख रही थी,! बेटा वो विन्दणी है तुम्हारी, जैसै मै बापू की, कैसे माँ, विस्मय से तेजू माँ के चेहरे पर आते जाते भावों को देखता रहा! 
श्यामा ने आखें मूदं ली, सिलवटें की खटर पटर गूंज रही थी, नन्ही उर्मि के, 
गृहस्थ जीवन  शुभारंभ हो चुका था! 


 गीता पांण्डे अपराजिता रायबरेली उत्तर प्रदेश
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