कथा प्रतियोगिता में डाॅ सरोजा मेटी लोडा़य की लघुकथा सुभद्रा_palolife

*सुभद्रा*

 श्रीमती सुभद्रा जी  ..आदरणीय श्रीमती सुभद्रा जी .. क्रपया मंच पर आइए और सम्मान स्वीकार  करे ।' सुभद्रा जी मंच के तरफ बढ रही थी। सभा तालियों से गुंज रही थी। सभासद कृषि महिला सुभद्रा जी की तारीफ कर रहे थे। 
    जैसे -जैसे सुभद्रा जी मंच के तरफ बढ रही थी वैसे -वैसे  उनकी प्रशंसा हो रही थी।  सुभद्रा को अपने बीतें  दिन याद आ रहे थे।  अर्जुन के पिता उमापती जुवी ने अफने बेटे का सुभद्रा के साथ करा दिया था। सुभदारा इंजनीयरिंग पदवी प्राप्त की थी। अर्जुन बी एस सी पदवी हासिल कर अफने गाँव में ही खेती कर रहा था। पिता उमापती जमींनदार थे। इकलौता पुत्र सुगुण ,तेज  कांति के लड़का था। सुभद्रा भी गाँव की लड़की थी मगर शहर में पढी लिखी थी। शादी के पहले सुभद्रा के पिता रावबहद्दूर ने कहा था ' बेटी सुभद्रा चिंता मत कर, शादी के बाद तू पति को प्यार से समझाकर शहर लेके जाओ, कौन ऐसा पति है पत्नी की बात को अनसुना कर दिया।'हँसते हुए बेटी का विदाई कर हाथ धो लिया। सुभद्रा अपने परिवार में सबसे छोटी लड़की थी।शहर में पढाई की थी। गाँव में रहना उसे घुटन सी लगता था। अब अर्जुन बहध्दूर के साथ साथ फेरे कर चुकी थी। सुरपुर में पैर रखते ही उसे अजीब सा एहसास होने लगा। थोडे ही दिन में पति -पत्नी के बीच में  शहर जाना की बात दीवार जैसी अड़चन बन गयी। ' नहीं .. नहीं मैं हरगिज नहीं आऊंगा। मेरे ये खेत.. मेरी आत्मा है। अर्जुन की बात से सुभद्रा के शहर जाने के  सपनें ,सपने ही रहने जैसे महसूस हुआ।  सुभद्रा अगले दिन पति के साथ खेत-खलिहान में घुमने गयी। अर्जुन कहने लगा 'देख सुभद्रा सरसों का खेत सौंदर्य देख , यहाँ देख उस खेत में थोडी जगह में पिता जी भिंडी, ककडी़ खद्दू ,ठ
टोमटो .. सब्जियाँ भी उगाने लगे।आज राव बहध्दूर जमींनदार भी एम .ए  पास किसान है। ' सुभद्रा पति की बात कों सोचते परखने लगी। 
    गाँ के सड़के  साफ सुथरे , जहाँ देखते वहाँ खेत ही खेत हरियाली फसल ओढे सज के बैठी जैसी खडी़ थी।अर्जुन सावन की झले का मजा़ कहाँ शहर में मिलेगा ? देशी घी महक ,मिट्टी की खुशबू अर्जुन को बाँध के रखे थे। सुभद्रा दो दिन खाना नहीं खायी पर अर्जुन जीत लिया था। सुभद्रा गाँव में तयार हो गयी । थोडी़  खेती की जिम्मेदारी  सुभद्रा को सौंप दिया ।उसे हर तरह की सुविधाएँ ससूर जी और पति व्यवस्था कर लिए थे। 
   सुभद्रा अपनी इंजनीयरिंग पढाई को कृषि उध्योग करने में उपयोग करने लगी। सब्जी, जुवार,गेँहू, मिर्ची ,और उसके साथ हार्टीकल्चर भी करने लगी। पति की परमार्श के साथ विज्ञान-टेक्नालजी भी पर्योग करते एक  *सफल महिला किसान सम्मान* पुरस्कार  दो साल से प्राप्त कर ली थी।इस साल तीसरी बार सम्मान के प्त्र बन चुकी थी।  सुभद्रा को हिम्मत और रूची देखकर अनेक शहर से फिदा हुए युवा किसान अभी गाँ से मोहब्बत करने लगे।  आज सुभद्रा उत्साह और अभिमान से सम्मान  सुरपुर गाँ के इंजनीयर बहू आज विश्व सराहनीय स्री मंच में विराजमान। गाँव की खुशबू सदा महकती  रहती है  सुभद्रा ही अनेक पढे लिखे युवाओं को मिट्टी का महत्ता बता रही थी। गाँव मेरा प्यारा सदा बहार।

डाॅ. सरोजा मेटी लोडा़य ।  कर्नाटक हुब्बल्ली।

5 टिप्‍पणियां

Unknown ने कहा…

Kahani subhadra prernadayak.

राजकुमार जैन राजन ने कहा…

सरोजा जी की एक उत्कृष्ट लघुकथा के लिए बहुत बहुत बधाई

Rekha Kinger Roshni ने कहा…

सरोजा जी बहुत ही प्रेरणादायक लघु कथा के लिए आपको साधुवाद और बहुत-बहुत बधाई����‍♀��

Unknown ने कहा…

Badhiya kahani

Unknown ने कहा…

Bahut sundar hain 😍🌹👌👏