सुषमा सक्सेना जी की कहानी कथा महोत्सव में। अवश्य पढ़ें_srisahity

                              रमा                                         आज हवेली को दुल्हन की तरह सजाया जा रहा था फूलों से लेकर लाइटों की जगमगाहट तक कहीं कोई कसर बाकी  न थी और हो भी क्यों  बङे इंतजार के बाद बाबू साहेब और मां साहेब की हसरतें पूरी होने वाली थी जीजा साहेब रूप कंवर का विबाह जिसके लिये  ना जाने कितने अरमान सजाए थे मां साहेब और बाबू साहेब ने मिलकर ,आखिर सदियों के बाद हवेली में लक्ष्मी आई थी ! बचपन  से लगा कर आज तक उनकी किसी बात  को इस हबेली मे  टाला न गया था और आज जब जीजा साहेब बड़ी हो गई तो बहुत ही देखभाल और खोजबीन के वाद उनका विवाह चौधरी राजेन्द्र सिंह  के साथ होना तय हुआ, राजेंद्र सिंह की लंबी चौड़ी रियासत थी दूर-दूर तक फैले हुए खेत ,जहाँ तक  निगाह भी न जाये,फैली हुई जागीर यहाँ तक की स्वयं  महाराजा भी बावू साहब का वेहद मान सम्मान करते थे यही कारण था कि गाँव  मे  भी उनका अच्छा दबदबा था ! आज उत्सव का माहौल था पूरे गांव में सभी लोग सज धज कर नाच गा रहे थे ,सभी का  सिगङी न्यौता जो था  ! और हवेली में  रूप कँवर  अपने कमरे में दुल्हन बनी  लाल जोड़े मे गजब ढा रही थी और नैनों में इंतजार था सुंदर सजीले कुंवर राजेंद्र सिंह राठौड़ का और अंततोगत्वा बड़ी ही धूमधाम के साथ उनका विवाह संपन्न हुआ विदाई के समय अन्य मांओ  की तरह मां साहेब ने भी अपनी बेटी को नसीहत दी बेटा ससुराल में सब की लाडली  वन कर रहना क्योंकि वही अब तुम्हारा घर है नीर भरे नैनो के साथ रूप कंवर ने अपनी मां की बात गांठ बांध ली और चल दी अपने नए सफर की तरफ!
14 वर्षीय रूप कंवर और 21 वर्षीय राजेंद्र सिंह 7 वर्षों का अंतर दोनों की उम्र में था रूप में लड़कपन तो था ही पर साथ में धीर  गंभीरता भी थी नए परिवेश में रमने में उन्हे अधिक समय न लगा  इकलौती  बहू थी वह
अपने खानदान की सासू मां उनका पूरा ख्याल रखती थी  और वह चाहती थी जब तक रूप कंवर 17 अट्ठारह वर्ष की ना हो उनका अपने पति के साथ कोई शारीरिक संबंध ना बने परंतु राजेंद्र सिंह अपनी  पूरी जबानी पर थे, सुंदर सजीली बीवी के होते हुए भी उसके  रसपान  से वंचित थे पर मां साहेब के कठोर अनुशासन और पहरेदारी के चलते हुए कुछ भी ना कर पाते उनका मन चाहता था  इतनी दूर-  दूर  तक फैलै खेतों में रूप  को बुलाएं उनके साथ वक्त व्यतीत करें और जिंदगी का आनंद लें इतनी बड़ी जमीदारी थी उनके पिता की जिधर नजर डालो उधर ही सब कुछ अपना गांव में काफी  इज्जत थी स्वयं महाराजा  का हाथी उन्हें दरबार में ले जाने के लिए आता था इन सबके बीच राजेंद्र सिंह की अपनी पत्नी को घुमाने की इच्छा  वहीं की वहीं  दबी रह जाती थी और सोचते थे ना जाने कब मिलन होगा!   इसी सबके बीच दिन पर दिन  व्यतीत होते जा रहे थे!
आज शाम जब राजेंद्र सिहं घर में घुसे रसोई घर से अलग-अलग पकवानों की महक आ रही थी आज तो कोई त्यौहार भी नहीं फिर यह सब अचानक सोच ही रहे थे राजेन्द्र  तभी नौकर आकर बोला भैया जी मां साहेब बुला रही है  वह तुरंत ही अपनी मां के कमरे की तरफ मुड़ चले मां साहेब अपने पलंग पर बैठी थी उन्हें देखकर एक मधुर मुस्कान उनके चेहरे पर आई और  वह बोली आज मेरे जीवन का विशेष दिन है, क्यों यह तो  आपको  कुछ घंटों के उपरांत पता चलेगा तुम अभी   मेरे कमरे में तैयार हो जाओ तुम्हारे लिए मैने नया कुर्ता पजामा मंगवा  दिया है आपके कमरे में?  प्रश्नवाचक निगाहों से कुंवर में अपनी मां साहेब की तरफ देखा हां तुम्हारे कमरे में अभी कुछ कार्य चल रहा है और पूजन है उसके बाद तुम अपने कमरे में जाना ! पूजन किस बात का बढ़ी उत्सुकता के साथ कुंवर ने पूछा माॅ साहेब के चेहरे पर एक  भेद भरी मुस्कान आ गयी पर परोक्ष मे उन्होने सिर्फ इतना ही कहाँ जाईये जल्दी से तैयार हो जाइये पूजन मे आपको और रूप को बैठना है! सोच रही थी माॅ साहब वक्त कितनी जल्दी निकालता है या कहो बहता है आज  रूप कबॅर पूरे 17 वर्ष की हो गई थी और उनका पिया मिलन था पर वह दोनों ही इससे अनजान थे मां साहेब का आदेश  था कि रूप कुबॅर को पूरे साजो श्रगाॅर के साथ  दुल्हन की तरह सजाया !  शाम को हवन पूजन के समय  जब राजेन्द्र सिंह ने रूप कुंवर को दुल्हन के भेष में देखा तो उनकी निगाहे उन पर से उठने का नाम ही नहीं ले रही थी इतनी सुंदर है वह इससे पहले तो कभी ना लगी थी सच ही कहते हैं सुहागरात के दिन ईश्वर दुल्हन को अतिरिक्त रूप सौंदर्य से नवाजता है और कुंवर के आश्चर्य का ठिकाना तब ना रहा जब रात्रि को उन्होंने रूप कुबॅर को उसी रूप में अपने कमरे में  सुहाग  सेज पर बैठे हुए पाया आज  उनकी  लंबे समय से चली आ रही  इच्छा जो पूरी होने जा रही थी रात्रि कब वीत गयी दोनो को पता ही न चला! दिन-रात सपनों की तरह उड़ रहे थे , कुवॅर  और रूप  दोनो एक दूसरे में खोए रहते थे मां साहेब उनका फलता फूलता प्रेम देखकर वहुत ही खुश थी और  शीघ्र ही  कोठी में नई किलकारी सुनने को  बेताब  थी  परंतु हमारा सोचा पूरा हो तो विधाता लिखित  को कौन माने ! समय के   आगे सब मजबूर होते हैं इंसान सोचता कुछ है  पर होता कुछ है ऐसा ही कुछ अनसोचा विना किसी आहट के उस शाम घटा जब बाबासाहेब मां साहेब और कुंवर  तीनों खाना खा रहे थे और रूप परोस रही थी तभी अचानक से एक आगी का जलता हुआ गोला उन तीनों के सामने से घूम गया बाबासाहेब कुछ बोल भी ना पाए और अचेत हो गए गांव में इसे मूठ भेजना कहते हैं लोग अपनी दुश्मनी निकालने के लिए इस टोने-टोटके का प्रयोग करते हैं ना जाने किस दुश्मन का कार्य था यह जमीन जायदाद में सो दुश्मन होते हैं और  रूप कुछ समझ पाती तब तक सब कुछ खत्म हो चुका था इन तीनों कि तेरहीं एक साथ हुई रूप पर तो जैसे वज्रपात गिरा था हंसता खेलता परिवार क्षणभर में नष्ट हो गया था इंसान क्या-क्या सपने सजाता   है ,पर ईश्वर की महिमा  अलग ही  अपना रंग दिखाती है! बड़े दुख और अवसाद में थी रूप कुछ भी समझ पाने मे असमर्थ!  तेरहवें के बाद रूप को उनके  मां बाबा ने  काफी समझाया  और उन्हे अपने साथ चलने के लिए  रिजी करना चाहा ,मनाया भी  की अकेले कैसे रहोगी चलो हमारे साथ पर रूप सोचती थी " माना कि   बैशाखियाॅ सहारा देती है , मगर जहां से गिराती  वहां से उठाती नहीं ना "   काफी सोच विचार कर उन्होंने अपने मां-बावा  को समझा-बुझाकर वापस भेज दिया और सोचने लगी अब क्या करना है, दूर-दूर तक फैले खेत जमीन जायदाद से उनका मोह खत्म हो चुका था सोचती  थी कि जितना जीवन यापन के लिए आवश्यक उतना काफी है अतः अपनी जमीनें उन्होंने खेतिहर मजदूरों को आवश्यकतानुसार देना शुरू कर दिया!  गीता  रामायण पढ़ना वह बचपन से जानती थी तो काफी सोच विचार कर कोठी के एक भाग में   लड़कियों की पाठशाला खोल कर उन्हें पढ़ाना शुरू किया धीरे-धीरे उनकी ख्याति फैलने लगी मन लगाने का अच्छा साधन मिल गया था उन्हे  , और मानती थी वह विद्यादान से बढ़कर कोई दान नहीं होता  तभी अचानक एक दिन एक अछूत कन्या  रमा उनके पास पढ़ने के लिए आई उन्होंने सहर्ष उसे अपने विद्यालय में आने की इजाजत दे दी परंतु गांव का परिवेश का वर्ण व्यवस्था अभी भी चरम सीमा पर थी सुवर्ण  लोगों को कहां पसंद आता कि एक अछूत कन्या वहां पर पड़े उन्होंने इसका विरोध करना शुरू किया और अपनी कन्याओं को भेजने से मना कर दिया इस बात से  रूप काफी आहत हुई  परंतु बड़े सोच विचार के बाद शाम के अंधेरे में लैम्प  पोस्ट के नीचे वह उस अछूत कन्या रमा को पढ़ाने लगी, लड़की जहींन थी थोड़े ही समय में गीता का 18 बा अध्याय विवरण सहित उसने पढ़ लिया 2 महीने हो गए थे उसे पढ़ते-पढ़ते अचानक से गांव में एक अरब शेख आए और रमा के मां-बाप ने पैसे लेकर उसके  के साथ रमा का  ब्याह कर दिया इस तरह वह अरब  पहुंच गई  और उसके साथ रहने लगी यहां पर भी  बह चोरी चोरी गीता  पढती  रहती थी !
जमाना बदल चुका था शेख की मृत्यु हो चुकी थी रमा अपने पुत्र के साथ लंदन में रहने लगी थी किंतु आज भी वह अपनी शिक्षिका को नहीं भूली थी यहां पर भी वह पूरे मनोयोग के साथ  गीता की शिक्षाओं के प्रचार प्रसार में लगी थी!                                                        आज एक मुद्दत के बाद उनका इंडिया आना हुआ वङी इच्छा थी रमा की अपनी शिक्षिका से मिलने की अतः सबसे पहले  उन्होंने अपनी शिक्षिका से  मिलने का और उनका पता लगाने का निश्चय किया  और पता  लगाते लगाते पहुंच गयी बह जहां  रूप कबॅर आजकल अपने भाइयों के साथ रह रही थी पर अफसोस वहां पर भी  रमा उनसे मिल ना पायी  तो जाते जाते बड़े ही निराश मन से उन्होंने अपना लंदन का पता देते हुए कहा उनसे कहिए मुझे पत्र जरूर लिखें मुझे उनके पत्र का इंतजार रहेगा अगली बार  जब भी इंडिया आऊंगी तो फिर उनसे मिलने आऊंगी उन्हे  लग रहा था मानो कितना बडा  कार्य वह अधूरा छोड़ें जा रही थी!      और रूप कबॅर जब उन्हे  यह  पता चला कि उनकी शिष्या उनसे मिलने आयी थी और बह उससे नहीं मिल पायी
अथाह दुख के सागर मे डूव गयी उनका बस चलता तो तुरंत उङ कर उनके पास चली जाती पर बह जमाना अलग था विदेश जाना इतना आसान न था फिर बङे ही भरे मन से अपना सम्पूर्ण प्यार और आशीर्वाद उन्होंने रमा के ऊपर उङेलते हुये  उन्हे खत लिखा यह
बात तब की है जब विदेशों में खत लिखना बड़े गर्व की बात मानी जाती थी और मैंने उस समय पहला पत्र जो कि उनका लिखा हुआ था अंतरराष्ट्रीय पोस्ट किया  !
कितने आश्चर्य की बात है  ना  आज भी हमारे समाज के ग्रामीण परिवेश मे वर्ण  ब्यवस्था, श्रम विभाजन के साथ  साथ अन्य कुरुतियों मे कोई परिवर्तन नही एक तरफ आधुनिकता की ओर बढ़ता शहरी हिस्सा दूसरी तरफ ग्रामीण परिवेश का उत्थान न होना  ! किसी  भी समाज के  सर्वांगीण विकास के लिए  चारो तरफ देशकाल परिस्थियां  एक समान  होने पर ही हम पूर्ण तया पुष्पित पल्लवित और विकसित हो सकते है  यही नही आज भी हमे रूप कबॅर जैसे शिक्षक जो कि बिना किसी भेदभाव के समाज को शिक्षित करे की आवश्यकता है साथ ही रमा जैसे शिष्य जो शिक्षकों को समुचित आदर सम्मान दे तभी आने बाली पीढी को सही अर्थों मे संस्कारित कर सकते है)

यह कहानी स्वरचित एवम सत्य घटना पर आधारित है 

इसके समस्त अधिकार लेखिका के पास सुरक्षित हैं 

सुषमा सक्सेना 

9024226998

21 टिप्‍पणियां

ARVIND AKELA ने कहा…

वाह,'बहुत अच्छी कहानी।

Unknown ने कहा…

Appreciate 👍🏻

बेनामी ने कहा…

👍👍

Unknown ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कहानी है जिसमें समाज को शिक्षा परिवार व परिवार में आर्दश भी झलकता है एवं गुरु व शिष्य के भाव व शिक्षा के महत्व वो समाज उत्थान कैसे हो इसकी जानकारी भी प्राप्त होती है।

Sushamasaxena ने कहा…

धन्यवाद आप सभी के सहयोग के लियें

बेनामी ने कहा…

कहानी अपने आप में अनेक चीजों की ओर इंगित करती है एक तरफ सामाजिक परिवेश जिसमें ग्रामीण और शहरी का विस्तृत रूप से वर्णन है कि किस तरह हमारा समाज विभाजित है दूसरा गुरु शिष्य का महत्व कि दोनों का आपसी समन्वय समाज को नई दिशा दे सकता है।

Sushamasaxena ने कहा…

धन्यवाद इतने अच्छे विवेचन के लिये

Apoorva ने कहा…

Beautifully written, nice story.

बेनामी ने कहा…

कहानी के पात्रों मासाहब बाबू साहब जीजाबाई राजेंद्र चौधरी आदि से लगता है कहानी पौराणिक राजघराने
परिवार से संबंधित है कहानी पढ़ते पढ़ते ही घटना आंखों के सामने घटित हो रही है।

Unknown ने कहा…

Awesome..beautifully written.one can easily relate.

Unknown ने कहा…

Bahut achchhi kahani h..is se khandani Rajpoot gharane me adab,sanyam aur sabhyata ka pataa chalta h.
Vidyarthi aur sikshika ke man ke agoodh prem ko jaana ja sakta h...aur kahani ke maadhyam se kathakaar is baat ko ingit karti h ki grameen anchal me aaj bhi shiksha ke abhaav ke kaaran log jaagruk nahi h..
Hame Bhaarat ka asli vikaas karne ke liye apne gaavo me shiksha ka prachaar-prasaar karna bahut zaroori h

विकास सक्सेना ने कहा…

आपके द्वारा लिखित कहानी अच्छी है जिसमें एक खानदानी बाल विधवा अपनी संपत्ति को गरीबों में दान दे देती है और जातिगत भेदभाव से उठकर समग्र शिक्षा पर जोर देती है

Unknown ने कहा…

Lekhika ki shabdo par pakad bahut mazboot h jis se unka lekhan me anubhav pradarshit hota h..kahani ki ek-ek kadi ko shandaar tareeke se pirokar jo khoobsoorat mala bani h...vo ati sunder h...katha ka bhav bh
prashansneeya h

Unknown ने कहा…

Sushma Saxenaji ko Saadhuwad jinhone apni sunder kahani ke maadhyam se gaanvo me aaj bhi chal rahi kureetiyo par prakaash dala h...saath hi is kahani se ye bhi pata chalta h ki Tantra-Mantra se kis tareh hasta-khelta pariwar tabaah ho jaata h..in cheezo par rok lagni chahiye..
Baar-baar padhne laayak h ye kahani

बेनामी ने कहा…

लेखिका द्वारा कथा के पात्रौं का बेहद मर्म‌‌‌ स्पर्शी व संजीव चित्रण किया गया है। जहां भारतीय महिला का ससुराल के प्रति समर्पण दर्शाया गया है वहीं समाज में व्याप्त कुरीतियों का विश्लेषण भी भली-भांति किया है। मानव मन के हर कोने को छूने वाली कहानी लिखने के लिए लेखिका प्रशंसा की पात्र है।

Unknown ने कहा…


बहुत ही सुन्दर कहानी है जिसमें समाज को शिक्षा परिवार व परिवार में आर्दश भी झलकता है एवं गुरु व शिष्य के भाव व शिक्षा के महत्व वो समाज उत्थान कैसे हो इसकी जानकारी भी प्जा

तिगत भेदभाव से उठकर समग्र शिक्षा पर जोर देती है

दीपाली सक्सेना ने कहा…

कहानी का बहुत सुन्दर एवं सजीव चित्रण,पड़ते पड़ते कहानी मै ही खो गई

Sushamasaxena ने कहा…

Aap sabhi la dhanwad

RUCHiKA SHARMA ने कहा…

बहुत ही सुंदर विवरण सामाजिक दृष्टिकोण का

Sushamasaxena ने कहा…

Nice ruchika

Unknown ने कहा…

वाह अति सुंदर विचार व्यक्त भी बहुत सुंदर तरीके से किये गई