प्रेमचंद कथा प्रतियोगिता में अर्चना जी की कहानी खुशियों की पोटली_srisahity


खुशियों की पोटली


झाबुआ विंध्य पहाड़ियों से घिरा हुआ अत्यंत ही मनोहर प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां के गांव में भोले-भाले आदिवासी निवास करते हैं और खेती-बाड़ी करके अपना गुजर बसर करते हैं । झाबुआ के समीप ही अलीराजपुर जिला भी है। झाबुआ-अलीराजपुर इन दोनों क्षेत्रों के आसपास बसे हुए गांवों में डाकन जैसी एक अत्यंत ही दूषित      मानसिकता वाली कुप्रथा प्रचलित  हैं । 

                               बहुत पुराने समय की बात है।झाबुआ जिले के समीप बसे हुए एक गांव पिपली पाड़ा में सजनबाई नामक एक ग्रामीण महिला संयुक्त  परिवार में हंसी-खुशी अपने पांच बच्चे और सास-ससुर के साथ निवास कर रही थी। मगर गांव वालों से उस परिवार की खुशी देखी नहीं गई । एक दिन अचानक गांव के लोग उसके घर पर आ धमके और उसे डाकन-डाकन कहकर चिल्लाने लगे। जब घर के लोगों ने इसका कारण जानना चाहा तो पता चला कि गांव में पड़ोस के ही परिवार में एक बच्चे की मौत हो गई थी और दूसरे दिन गांव के ही किसी अन्य परिवार के बच्चे की मौत हो गई।इन दोनों परिवार के अंधविश्वासी लोगों ने गांव के बढ़वे (ओझा) के पास जाकर पता किया कि गांव के बच्चों के अचानक मौत होने का कारण क्या है ?  बडवे (ओझा) ने बताया कि कालू की पत्नी सजन डाकन है और वह गांव के बच्चों को खा रही है अगर वह ज्यादा दिन यहां रही तो सारे बच्चों को खा जाएगी। गांव में पंच बैठाई गई। पंचों ने फैसला दिया कि सजनबाई को गांव से बाहर निकाल दिया जाये वरना गांव के सभी बच्चों को खा जायेगी।यदि उसे गां से बाहर नही निकाला गया तो उसके परिवार का हुक्का पानी बंद कर दिया जाएगा। पंचों का फैसला सुन सजन बाई के ससुराल वालों और पति ने उसे बहुत मारा- पीटा, बुरा-भला कहा।एक दिन सजनबाई का पति कालू पंचों के फैसले के अनुसार अपनी पत्नी और पांचों बच्चों को साथ लेकर सुदूर एक शहर नागदा पहुंचा और चुपके से बिना बताए स्टेशन पर ही उन सबको छोड़ कर वापस गांव आ गया।जब बहुत देर हो गई और उसका पति कालू नहीं लौटा तो सजनबाई को विश्वास हो गया कि उसका पति उसे छोड़कर चला गया है। उसने अपने आस-पास के कचरे के ढेर से  प्लास्टिक की थैलियां बीन-बीनकर अपने बच्चों का जैसे-तैसे भरण पोषण करना शुरू किया।

                     एक दिन सजन बाई को किसी सज्जन व्यक्ति ने सलाह दी कि तुम झाबुआ जाकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाओ तुम्हें न्याय जरूर मिलेगा । सजनबाई  वापस झाबुआ आई और न्यायालय पहुंची ।किसी ने उसे वकील महोदया से मिलने के लिये उनका पता उसे दिया। वकील महोदया राठौर जी से वह मिली और उसने, उनसे कहा कि उसे अपने पति के साथ गांव के लोगों को भी सजा दिलवानी और सारा किस्सा बताया। उसे न्यायलय में केस लगाना है।वकील मैडम ने विधिक सेवा प्राधिकरण  के माध्यम से उसका आवेदन लगवाया। सर्वप्रथम उसके एवं बच्चों के रहने के लिए स्थान की व्यवस्था करवाई तथा उनके द्वारा संचालित विद्यालय में उसे चपरासी की नौकरी भी दी । मैडम ने समीप के ही एक गॉंव में तत्कालीन मंत्री श्रीमती रावत के सहयोग से एक छोटा सा भूमि का टुकड़ा उसे दिलवा दिया,जहां उसने अपने परिवार के  लिए छोटा सा कच्चा झोपड़ा बनाया इसके लिये उसने वकील मैडम से जो भी आर्थिक मदद ली थी, धीरे-धीरे उसने मेहनत करके वह पैसे भी उन्हें चुका दिये।

                           उसके पास विद्यालय में चपरासी का कार्य था ही जिसे करते हुए वह अपने बच्चों का लालन-पालन अच्छे से करने लगी किंतु किसी का सुख सभी की आंखों में खटकता है।सजन बाई खूबसूरत थी। आस-पड़ोस में रहने वाली महिलाऐं उससे जलन रखने लगी और  उस पर लांछन लगाने लगी ।आए दिन उससे अपने पति पर डोरे डालने के आरोप में लड़ाई-झगड़े करने लगी।अक्सर पुलिस में छोटी-छोटी बातों को लेकर रिपोर्ट होने लगी।सजनबाई हमेशा वकील मैडम के सामने अपना दुःखड़ा रोती । वकील मैडम ने उसे सलाह दी कि तुम अपने पति को बुलवाओ। उसके गांव का सरपंच अक्सर किसी न किसी काम से जिले में आता रहता था। सजनबाई ने अपने गांव के सरपंच के द्वारा खबर भिजवा कर अपने पति कालू को मैडम के सामने उपस्थित करवाया।मैडम ने उसके पति को डराया ,धमकाया और समझाया भी । उन्होंने कहा कि कोर्ट में तुम्हारे खिलाफ केस लगाया गया है यदि तुम अपनी पत्नी और बच्चों को अच्छे से नहीं रखोगे तो तुम्हें जेल हो सकती है क्योंकि तुमने बहुत बड़ा और जघन्य अपराध किया है ।अपनी पत्नी को डाकन कहकर उस पर आरोप लगाया मारा-पीटा और उसे बच्चों सहित घर से बाहर निकाल दिया। अब अगर तुमने.अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया तथा उनके साथ सही ढंग से नहीं रहे तो तुम्हें कई वर्षों की जेल हो जायेगी।यह सुन कालू घबरा गया और उसने अपनी पत्नी से मांफी मांगी और वकील मैडम से कहा कि उसका प्रकरण न्यायालय से उठा लिया जाए, अब वह अपनी पत्नी को हमेशा अच्छी तरह से रखेगा किंतु  वकील महोदया ने उसका प्रकरण अभी न्यायालय से उठाने से इंकार कर दिया।उन्होंने कहा कि पहले तुम कुछ समय अपनी पत्नी के साथ रहो और बताओ कि तुम अपने परिवार का भरण पोषण अच्छे से कर रहे हो और सभी के साथ अच्छा व्यवहार कर रहे हो ।

                        सजन बाई को अपने पति के साथ अच्छी तनख्वाह पर एक होटल में काम मिल गया। जहां उसे दोनों की तनख्वाह मिलाकर अच्छी आमदनी होने लगी और वह अपने पति और बच्चों के साथ खुशी-खुशी जीवन यापन करने लगी। धीरे-धीरे उसके पति ने पैसे बचा कर एक घोड़ी खरीदी और शादी ब्याह में उस घोड़ी को किराए पर देने लगा।इधर सजनबाई ने भी पैसे बचाकर बकरियां और गाय खरीदी। गाय का दूध और बछड़े  बेचकर उसे अच्छी- खासी आमदनी होने लगी। उसने अपने बच्चों को पढ़ाने हेतु विद्यालय में भर्ती किया। धीरे-धीरे जब सजनबाई के घर में सुख समृद्धि संपन्नता आने लगी तो वही गांव के लोग जिन्होंने उसे डाकन -डाकन कहकर गांव से बाहर निकलवा दिया था और जो पंच-सरपंच उसकी ओर देखते भी नहीं थे, वे सब जब भी उसके गांव में अपना कोई काम करने के लिए आते तो उसके यहां पर ही ठहरते और सजनबाई भी उनका खाना-पीना करके ही वहां से उन्हें वापस भेजती।

                        सजनबाई ने अपने पति और सभी गांव वालों को माफ करके, पुरानी बातों को भूल कर उन सब के साथ अच्छा व्यवहार किया। धीरे-धीरे उसने अपने सभी बच्चों की शादियां भी कर दी। आज वह एक बहुत बड़ा घर बनाकर राजी-खुश पति और बेटे-बहुओं के साथ अपने गांव में ही निवास कर रही है। आज वो अपने बेटे के साथ मिलकर स्वयं का सब्जी और दूध का व्यापार कर रही है और खेती में भी पति को मदद करती है। सब को माफ करके उनसे सद्व्यवहार रखने से उसके जीवन में पुनः खुशहाली लौट आई। उसका घर छोटी-छोटी खुशियों की पोटली से भर गया।

       डॉ. अर्चना राठौर,

लेखिका एवं समाज सेविका

       झाबुआ, (म.प्र.)

       पिनः ४५७६६१

चलित दूरभाष:७८६९३०८५६५

4 टिप्‍पणियां

Sushamasaxena ने कहा…

लेखिका ने समाज के ग्रामीण परिवेश मे व्यापत कुरूतियो के साथ ही उसके निवारण का संदेश दिया है एक समाज सेविका होने के नाते उनका कार्य सराहनीय है

Vikrant Pandey ने कहा…

समाज के बदलाव का सटीक चित्रण। लेकिन शोषित वर्ग को तभी कुछ हासिल हो पायेगा जब राठौर मैडम जैसे अन्य लोग भी बिना हिचक आगे आकर मदद करें। वैसे ये सत्य कथा जैसी लगती है।

आकाशगंगा ठाकुर ने कहा…

खुशियों की पोटली कहानी बहुत ही अच्छी लगी, यह वाकई में एक सच्ची घटना प्रतीत होती है,
एक समाज सेविका के रूप में आपने बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले अंधविश्वास से पाठकों को अवगत कराया है।👌

डॉ.अर्चना राठौर अधिवक्ता, ने कहा…

सुषमाजी, विक्रमजी और आकाश ठाकुर जी ने मेरी कहानी पढ़ने के लिये समय निकाला और उस पर अपने विचार भी व्यक्त किये ।मैं आप सभी के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ।