मेहंदी और नारी-ममता-मनीषा-srisahity

"मेहंदी और नारी"                    **************
क्या अंतर है सोचो यहां नारी या मेंहदी में,
एक बस जाती एक रच जाती ज़िन्दगी में।

माँ के आँगन में नव जीवन का जन्मना,
मेहंदी के हरे नव कोपल का निकलना,

बाबा के द्वारे चहचहाना खिलखिलाना,
नवकोपल का वायु संग झूमना लहराना,

हँसी के ऊपर किशोरी लज्जा अवतरित,
हरीतिका भीतर सम्पूर्ण लालिमा गर्भित,

अपनो से छूट संगी के संग महापलायन, 
डाली से टूट किसी हथेली में बसन रचन,

सबंधो के बाग में स्व समर्पित हो जाना,
सिलबट्टों के पाट पीस अर्पित हो जाना,

नवगृह में प्राण निर्वाण तक बस जाना,
हथेलियों में सदा सौंदर्य सम रच जाना,

क्या अंतर है सोचो यहां नारी या मेंहदी में,
एक बस जाती एक रच जाती ज़िन्दगी में।
🙏🙏
ममता मनीष सिन्हा
तोपा, रामगढ़ (झारखंड)
(स्वरचित मौलिक रचना)

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