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प्रेम कहानीअनूठा प्रेम-ss

प्रेम कहानी
अनूठा प्रेम

      वो सुन्दर सी पालकी "गुलाब के  फूलो से सजी हुई थी।उन फूलो की खूश्बू से पूरा वातावरण सुगान्धित था।हवा के झोकेअपने होने का अहसास दिला रहे थे।
रुपमती का यौवन उसकी स्वरलहरियो" जैसा परिपूर्ण था।
उसकी लटे उसकी  खूबसूरती कोऔर भी ज्यादा निखार रही थी।पालकी को कहारो ने महल के प्रागंण मे उतारा "बहुत सारी दासियो ने पालकी को घेर लिया" ।
पालकी के बाहर  पैर रखते ही नूपुर की छुनछुन की आवाज चूड़ियों की खनक उस प्रागंण मे अपने मीठे अनुराग पैदा करने लगी।
रूपमती पालकी से बाहर आ गई। "शसारी दासिया उसे अवाक सी देखती रही।उसकी खूबसूरती  को नजर न लगे
दासी रजला ने रूपमती के चेहरे को घूघट से ढक दिया।
और रूपमती का हाथ पकड महल की ओर बढ गई।

बाजबहादुर की धड़कनें बेताहासा धड़कने लगी।उसकी कुछ मर्यादा थी ।वो राजा था।वो अपनी प्रेयसी को गले नही लगा
सकता था। पर उसका मन बार बार विह्रवल हो रहा था।
धीमे कदमो से अहिस्ता अहिस्ता कदम बढा रही थी ,रुपमती,
पूरे रास्ते मे  फूल बिछे हुऐ थे उसके स्वागत में अब तक पूरे महल मे उसकी खूबसूरती की चर्चा हो रही थी।
सब उसकी एक झलक पाने को बेताब थे।
      महल की खूबसूरती साजोसज्जा देख हैरत में थी रुपमती। महल तो बहुत बड़ा न था, पर शानो शौकत में लाजबाब था।  बाहर के बगीचे फव्वारे सब मन मोह रहे थे ।सबसे खूबसूरत वादियों में बसा माँडवगढ ।बारह दरवाजे पार कर घूंघट की आड़ से नजारों को देखती हुई खो सी गई थी रूपमती ।कक्ष मे कदम रखते ही सुकून मिला उसके मन को।आप जाईऐ हमे कुछ देर आराम करना है।वो दासी रजला की ओर उन्मुख होकर बोली।
जी महारानी! रजला नतमस्तक हो कक्ष से बाहर चली गई मसनद अपनी ओर खीचते हुऐ वो पँलग पर अधमुँदी आँखो के साथ अतीत की गहराईयो मे खो गई।
साँरगपुर मे जन्मी रुपमती राजपूत कन्या सर्वगुण सपन्न थी।खूबसूरत इतनी की साक्षात रति का रुप हर कार्य मे निपुण सँगीत तो रग रग मे बसा हुआ था।उसकी स्वरागिनी साक्षात माँ सरास्वती कँठ मे विराजमान रुपमती की खूबसूरती और गायन की ख्याति की खबर पूरे मालवाअँचल मे फैल गई ।माँडवगढ के राजा बाजबहादुर के कानों तक पहुँची। तो वो वेश बदलकर सारँगपुर पहुँच गये।बाजबहादुर को सँगीत मे बहुत रुचि थी।वो कई दिनो तक रुपमती के निवास के आसपास घूमते रहे । एक सुबह उनकी आँख खुल गई भोर की बेला थी। बहुत ही मीठी स्वरागिनी उनके कानो मे अमृत घोल गई'वो उस आवाज की तालाश में आगे बढे़। वो आवाज कही दूर खो गई।वो बेचैन  हो गये।
अगली सुबह फिर वही सँगीत वो उस आवाज के पीछे चल दिये और आगे बढे तो कुछ लड़कियां नजर आयी । अब तक कुछ उजाला फैलने लगा था।नर्मदा तट अब साफ नजर आने लगा।उन लड़कियों मे से एक लडकी नर्मदा की ओर मुख करके खडी़ थी। दोनों हाथ जोडकर माँ नर्मदा से प्रार्थना कर रही थी। बाजबहादुर आगे बढे और उसके सन्मुख जाकर खडे हो गये। उसका रुप सौन्दर्य देख पलके झपकाना भूल गये राजा बाजबहादुर। रुपमती ने आँखे खोली-सामने खडे नवयुवक पर नजर पड़ते ही सकुचा गई और पलके झुका भाग कर अपनी सखियों के पास आ गई ।
बाजबहादुर उसके रुपसौन्दर्य मे खोया रहा।
उनके जाते ही बाजबहादुर ने मल्लाह से उनके बारे मे पूछा तो मल्लाह ने बताया यही रूपमती है।अपना दिल हार चुके राजा ने नर्मदा मैय्या से प्रर्थना की कि रुपमती उनकी जीवनी सँगिनी बने और वो माडँवगढ लौट आ।
समय के साथ रुपमती के लिऐ उनका प्रेम चरम पर पहुँच गया।
इधर रुपमती का भी वही हाल था।उस नवयुवक की छवि उसके दिल मे बस गई ।उसके सारे गीतो मे बस उस नवयुवक के लिए ही प्रेमरस बरसता।
कुछ समय बाद ही माँडवगढ से सन्देश वाहक रूपमती से मिलने पहुँचा सन्देश पढ़ रुपमती ने उसके जबाब मे सन्देश भेजा और अपनी तरफ से हां की मुहर लगा दी। कुछ दिनो मे ही माँडवगढ़ से बुलावा आ गया।फिर सारे रितिरिवाजो के साथ दोनो परिणय सूत्र मे बँध गये।
रानी जी-रजला की आवाज से आँखे खोली रानी रुपमती ने।राजा साहब का हुकुम है कि उनके आने के पहले आपको तैयार कर दिया जाय।शिव जी के दर्शन के लिऐ जाना है। दो दासिया रानी को स्नानगार की तरफ लेकर चली गई ।
शिवमन्दिर मे दर्शन के लिऐ एक गड्ढे मे उतरना पडता था।बाजबहादुर ने अपनी बलिष्ट भुजाओ मे रुपमती को समा लिया ।रुपमती के चेहरे पर ललिमा बिखर गई।

उस गड्ढे मे शिवजी का स्वँयम्भू रुप था।जो निरंतर बहते झरने के नीचे विरामान था।
शिव जी के दर्शन से गृहस्थ जीवन की शुरुआत की ।शिव का अशीर्वाद ले महल की ओर प्रस्थान किया,इस नवयुगल जोडे ने।
कक्ष मे प्रवेश करते ही इत्र और फूलो की खूश्बू से बाजबहादुर का मन उल्लासित था। वो रुपमती की ओर बढे और पीछे से बांहों मे कस लिया ।उन्हें फिर रुपमती के चेहरे को देखते रहे ।उन चिरागो की रोशनी मे मदहोशी छाने लगी ,दोनो एकदूसरे की आँखो मे खोये जा रहे थे। प्रेममिलन के गवाह उस रात सिर्फ वो चिराग थे।दोनो ने प्रेम आलिगँन मे जाने कितनी राते गुजार दी ।पर उनका प्रेम दिन रात चार चौगुना बढ़ता गया।रानी रुपमती नर्मदा के दर्शन करने के बाद ही कुछ ग्रहण करती थी।
उन्हें रोज दर्शन के लिए पहाडी़पर जाना पड़ता । राजा बाजबहादुर ने उसी पहाडी पर महल बनवा दिया।अब रानी हर सुबह माँ नर्मदा के दर्शन महल मे बनी छतरियों के नीचे से करती।
वो पूर्णिमा की रात दोनो प्रेमी युगल चाँद को देख रहेथे।रुप तुम मुझे कितना प्यार करती हो।
खुद से ज्यादा-रुप ने जवाब दिया
यदि किसी वजह से मैं तुमसे दूर हो जाऊं तो मैं इस पहाडी से कूदकर जान दे दूंगी ।बाजबहादुर ने उसे बांहों मे भींच लिया ।
माँडवगढ मे रानी रूपमती के आने के बाद से सँगीत विधा की शुरुआत हो गई ।उसी रँगारग महफिल मे तशरीफ लाऐ दिल्ली के वजीर आदम खां रानी के रुप और गायन को  देखकर मुग्ध हो गये और दिल्ली पहुँच कर सुल्तान अकबर को सारी बात बतायी।अकबर ने बाजबहादुर से रुपमती को माँग लिया।गुस्से मे बाजबहादुर ने अकबर की बेगम को माँग लिया।इससे अकबर आगबबूला हो गया और एक टुकड़ी मुगल सेना माँडवगढ भेज दी"बाजबहादुर प्रेमरस मे इतने 
डूबे की उन्हे खबर ही न हुई। जिस समय मुगल सेना ने महल मे कदम रखा, उस समय बाजबहादुर सभासदों के साथ बैठे थे, उन्हें बन्दी बना लिया गया। 
रजला अन्य दासियों सहित रुपमती महल के लिए  गुप्त मार्ग से ऊपर छतरी तक पहुँच गई ।कुछ मुगल सैनिक भी छतरी तक पहुँच गये।
रुपमती ने तलवार उठा ली। कई मुगलो के सिर पहाड़ियों से खरबूजे जैसे लुढ़कते चले गये ।रुपमती को लगा कि अब उनकी आबरू सुरक्षित नहीं है। तो वो हीरा निगल गई कुछ ही क्षणों मे उनका खूबसूरत जिस्म नीला पड गया ।उन्होने प्राण त्याग दिए।ये खबर जब बाजबहादुर तक पहुँची तो उन्होने भी अपनी जी़वन लीला समाप्त कर ली। उन दोनों का प्रेम अमर हो गया। इस घटना से अकबर को बहुत आत्मग्लानि हुई ।
राजा रानी की याद में उन्होंने उनका मकाबरा बनवा दियाऔर उसपर शहादत की कहानी वफाऐ हूर लिखवा दिया।बाजबहादुर और रुपमती का प्रेम अमर हो गया।आज भी माँडव में उनके प्रेम की स्वरलहरिया गूँजती है।  
 (
 कहानी सत्य घटना पर अधारित "कुछ कल्पनिकता भी है।मेरा उद्देश्य मात्र इतना हे।अपने इतिहास की भूली बिसरी यादो को सहेज सकूं और अपने प्रशँसको की कसौटी पर खरी उतर सँकू ।)
रीमा महेन्द्र ठाकुर
सहित्य संपादक
राणापुर ,झाबुआ, 
म.प्र.भारत

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