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परिणय की रजत जयंती-ss

परिणय की रजत जयंती
अनुराग भरे जीवन सफर में ,
           राग सुरभि सी सृष्टि करती हो।
प्रेम देवालय के प्रेम पुजारी हम,
         तुम प्रेम की प्रतिमूर्ति लगती हो।।

नौ मई शुक्र सन् संतानबे,
           अक्षय तृतीया परिणय सूत्र हो।
हैं प्रेम भाव के सरिता हम ,
              तुम प्रेम अक्षय के सागर हो।। 

विधाता की अनुपम सृजन,
       अप्सरा उर्वशी सी रचना होती हो ।
हैं प्रेम डगर के पथिक हम,
             तुम प्रेम की सौगात देती हो।

परिणयोत्सव की रजत जयंती,
                संग ऋतुराज हम देखें हो।
हैं प्रेम पतंग के पपीहा हम,
          तुम प्रेम बरखा सी बरसती हो।।

प्रिति के अजिर अमर रहे,
                प्रेम शाख की संवर्धन हो।
हैं प्रेम से अल्हादित हम,
            तुम प्रेम "राधे" सी करती रहो।।

राम रतन श्रीवास "राधे राधे"
बिलासपुर छत्तीसगढ़

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