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पढ़िए लखन कछवाहा की तीन रचनाएं_ss


आंखें 
आंखें ही हैं दिलों को, मिलाती हैं दोस्तों ।
आंखें नशा-ए-इश्क, पिलाती हैं दोस्तों ।।1।।
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आंखें हंसाती हैं हमें, आंखें रुलाती हैं ।
आंखें जगाती और सुलाती हैं दोस्तों ।।2।।
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वे-चैन करती तन-मन,बहकाये वाणी को ।
अंखियां अनेक खेल, खिलाती हैं दोस्तों ।।3।।
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जीवन के लिए सुख , सहेजती हैं सर्वदा ।
जीवों को दुख ये,आंख,दिलाती हैं दोस्तों ।।4 ।।
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कितना भी रखें स्थिर,मनवा न रह सके ।
'स्नेही' आंख मिलके, चलाती हैं दोस्तों ।।5।।
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हिन्दु स्वाभिमान" (सनातन धर्म)
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सोए हुए सब जन को,जगाना ही पड़ेगा ।
सूने जिगर में जज्वा, जगाना ही पड़ेगा ।।
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भगवा लिवास ओढ़ के,हरिनाम गायेंगे ।
मन को हरि के रंग में,रंगाना ही पड़ेगा ।।
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गूंजेगी आसमां जमीं,हरि राम नाम से ।
जयकारा हिन्दुओं को,लगाना ही पड़ेगा ।।
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अब तक सहे हैं और न, सहेंगे अब दमन । 
हिन्दुत्व स्वाभिमान, दिखाना ही पड़ेगा ।।
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यह भूमि पूर्वजों की,सनातन मिशाल है ।
'स्नेही' ये धर्म अपना, बचाना ही पड़ेगा ।।
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"हवा"
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जब हवा रुख बदल के चलती है ।
प्रकृति- हंसती और मचलती है ।।
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मन को झकझोर देतीं कलियां ।
रूप-रंग जब भी, ये बदलती हैं ।।
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तितली भंवरे मचलने लगते हैं ।
जब हवा खुशबुओं पे ढलती है ।।
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देख के वादियों की हलचल को ।
सोच दिल की नजर बदलती हैं ।।
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नज़रें चाहें भी, तो देखें कैसे ।
हवा 'स्नेही' छिप के चलती हैं ।।
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रचना--लखन कछवाहा 'स्नेही'
          मंडला,म.प्र.
          22/06/2022
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