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स्वर्णमुख आसमान_आए भोर दिनमान_ss

धनाक्षरी
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 स्वर्णमुख  आसमान, आए भोर  दिनमान,
 हवा चली मकरंद
 पूरब की ओर से!

 महीन आलोक रेख , पहली किरण देख,
 धरा अकुलायी तब,
 विहग  के शोर से  !

 मंद - मंद  से पवन, प्रफुल्लित तन- मन,
 विवस्तमान झांकते,
 नीले आसमान से !

 गृह- गृह राम राम, ध्यान लगा जपो नाम,
 आरती के स्वर फूटे,
  मंदिर मकान से !
                              सुषमा सिंह
                                   औरंगाबाद
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( सर्वाधिकार सुरक्षित एवं मौलिक)
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