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कहानी छल-ss

कहानी
छल
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"रेणु..!"

"हूँ। "   रेणु बिना उसकी तरफ देखे ही बोली थी । रेणु और वैभव शहर के एक पार्क में बैठे थे। वैभव रेणु को निहार रहा था, जबकि रेणु बगल की क्यारी में लगे फूलों के पौधों को निहार रही थी । पौधों में लगी कलियाँ पूर्णतः फूल बनने के प्रक्रिया में थीं । रेणु उसी प्रक्रिया पर सोच रही थी तभी वैभव बोला -

"विवाह के विषय में क्या सोचा है..?" 

रेणुं चौंकी थी । अभी पिछले हफ्ते वह घर से इसी पर झगड़ कर आयी है । दीदी के विवाह के बाद घर में अब उसी का क्रम था ।हालांकि बाबूजी को पता था कि रेणु को मना पाना एक भागीरथी प्रयास होगा, पर वे निराश नही थे,बोले--

"रेणु , नीलेश अच्छा लड़का है बेटा। "

उसे लगता था तन और मन, वह दोनों से तैयार नही है। एक अपरिचित भय से तन में उठी कंपकपी को सम्हाला और धीरे से बोली -

"मुझे विवाह नही करना है अभी।"

"यह क्या पागलपन है।" पिता हल्के रोष में बोले थे। "जीवन की गाड़ी अकेले नही चलती। पति-पत्नी एक दूसरे के पैर होते हैं । विवाह ना करने पर जीवन विकलांग जैसा होता है। उस जीवन का कोई अर्थ नही होता।" 

रेणुं हंस पड़ी ।
"अभी ना करने को बोली हूँ बाबूजी,सन्यासिन बनने को नही।"

"तुम्हारा बी ए पूरा हो चुका है ।
एक तेरी दीदी है,जहां कर दिया,सुख से रह रही है। खानदान की मर्यादा देखनी है कि नही?लोग क्या सोचेंगे,भान है तुझे?जिस खानदान की लड़कियां बारह वर्ष तक ससुराल चलीं जातीं थीं, उस खानदान में तू ग्रेजुएट हो गयी कुमारी होकर,यह कम है..?"

 पिताजी भन्नाये थे।कोने से अपनी सदरी खूंटी से उतारी और सोंटा उठाते हुये बोले -

"कोई नौटंकी मत करना।मैं लड़के वालों से मिलने जा रहा हूँ।"

 पिताजी के जाने के बाद वह घर से हास्टल फिर चली आयी थी।वैभव के बुलाने पर यहाँ पार्क में चली तो आयी थी पर मन घर के गहमा-गहमी में ही उलझा था। कि तभी वैभव द्वारा पिताजी ही वाला प्रश्न उसे विचलित कर गया था ।बोली -

"नहीं उसका अभी सोचा नहीं ।"

"सेक्स..?"

अब उसे वैभव पर तरस के साथ गुस्सा भी आ रहा था।अचानक उसे तरंग प्रेमी याद आया।वही तरंग जो बी ए प्रथम वर्ष में उसका क्लास मेट था।प्रेम पर कविताएँ करता था।उसकी कविताएँ उन दोनों के सम्बन्धों की सेतु बनीं थीं । एक दिन जब तरंग ने एक अभिरामी प्रेम गीत लिखकर उसके बैग में चुपके से डाला था तो किशोर से युवा हो रहे उसके मन में गुदगुदी हुयी थी।रात्रि में रुम मेट के सो जाने पर उसने उस पुर्जे को निकाल बार बार पढ़ा था।यह अतिशयोक्ति नही कि वह उन प्रेम गीतों की लहर तरंगो में बहती हुयी उस हिन्दी कवि पर मुग्ध हो चली थी।गीतों को पढ़ते हुये नायिका की छवि में अपना अक्स देखती और मुस्करा पडती। अगले दिन जब तरंग ने अकेले पाकर मन की बात कही तो लगा कनपटियां गर्म हो चली हैं। जवाब न देकर पलकों को गिराते हुये बस किंचित मुस्करायी थी । स्त्री मन  की गहरायी शायद तरंग को पता नही थी।एक अकेली लड़की, जो उसके प्रेम में है, से एकान्त में कुछ भी कहा जा सकता है, किया जा सकता है। ऐसा भ्रम उसे था पर दुनिया की नजर में एक अन्जान लड़के के साथ मुस्कराते,बात करते उसका देखा जाना उस कस्बाई लड़की के परिवार की मर्यादा के विपरीत था।वह बिना रुके,बिना बोले चली आयी। मन के गहनतम सतह पर भावविभोर होती वह कमरे तक तो आ गयी थी पर रात की नींद गायब थी । 'तरंग के गीतों की तारिका हूँ मैं..मुझे रुक कर बात कर लेनी चाहिए थी उससे.. पर नही अकेले लड़के के साथ देखते ही अपनी सहेलियां ही कानाफूसी चालू कर देतीं ' पता नही क्या क्या पूरी सोचती रही ।

कालेज में रेणु-तरंग का नाम दबे जुबान से छाने लगा था तभी एक दिन अकेले मौका पाकर तरंग ने उसे आलिंगन बद्ध किया था।तन मन में झुरझुरी सी उठी थी। यह सिहरन झनझनाहट के साथ भय भी पैदा करती है, सोचा था उसने।तभी उसे एहसास हुआ तरंग के चपल हाथ उसकी पीठ पर कुत्सित हैं ।पारिवारिक संस्कारों ने धकेला था उसे।मन में घृणा उत्पन्न हुयी।और बिना कुछ बोले कमरे पर चली आयी।ज्वर के बहाने कालेज तो नही गयी पर मन कमरे पर भी शान्त नही था। 'दादी के पच्चीसो बार मना करने के बाउजूद बाबूजी ने मुझे उस कस्बे से निकालकर यहाँ अकेले पढ़ने को भेजा है,उनका विश्वास टूटना घर की और लड़कियों का घर से दूर विद्यालय आने का रास्ता बन्द हो जायेगा '.. सोचा था उसने। पारिवारिक संस्कारों का दबाव था या स्वयं उसके शुचिता का प्रभाव अगले दिन बड़ी सख्ती से उसने तरंग को मना कर दिया था। फिर धीरे धीरे वैभव उसके जीवन में आया था।और आज जब वैभव ने सेक्स पर उसकी राय जानना चाहा तो उसे फिर गुस्सा आया फिर भी वह वैभव को तरंग की तुलना में बेहतर समझती थी।आहिस्ता से बोली -

"नहीं..मुझे सेक्स नहीं करना हवस के पुजारी..मुझे तो बस प्यार चहिए। " बनावटी ही सही पर मुस्कुराते हुये बोली थी वह।

"कैसा प्यार..?"

"यही कि कोई मेरा ख्याल रखे..मेरी बात माने..मेरे लिए गिफ्ट्स लाए..मुझे खुश रखे..मैं रूठूं तो मुझे मनाए। "

"यह सब आपके घर में पापा-मम्मी, भाई-बहन, भाभी ये सब नहीं करते..?"

"हां..करते हैं पर उसमें स्नेह,वात्सल्य,अधिकार,ममता होती है..एक लड़की को बड़ी होने पर एक ऐसा भी प्यार चाहिए जहां चंचलता हो, खिलंदड़ी हो,चुहल हो और विपरीत लिंगी आकर्षण हो।"

" पर सेक्स ना हो..यही ना..!"

 वैभव व्यंग्य से मुस्कराया था।उसकी इस मुस्कराहट से रेणु आहत हुयी थी , फिर भी अपने को संयत करते हुये बोली थी -

"सेक्स तो गृहस्थ आश्रम का एक धर्म है वैभव.. यह एक फिजकल आवश्यकता भी है.. इसी धर्म का निर्वाह करने के लिये हमारे ऋषि-मुनि भी विवाहित होते थे पहले। वे जंगलों में अपनी पत्नियों के साथ तपस्या करते थे।गौतम थे तो अहिल्या थीं।वशिष्ठ थे तो अरुंधति थीं।कश्यप थे तो अदिति थीं।"

"तो..?"

"तो क्या..! हमें विद्यार्थी जीवन से  गृहस्थ आश्रम में चलने तो दो।क्या हम पशु से भी गये गुजरे हो गये। वे भी एक उम्र आने पर ही यह सब करते हैं। पशुओं से हमें इसकी शिक्षा लेनी चाहिए। जीवन में बस सेक्स ही नही है।"

"मानता हूँ,फिर भी जीवन के विविध अनुभवों से गुजरकर ही हम उचित अनुचित का अनुभव कर पाते हैं,ऐसे में अनुभव लेने की दृष्टि से यह कहां तक गलत है?"

"वैभव..! तुम क्या समझते हो..हम लड़कियां क्या इस रंगारंग अनुभव को नही चाहती हैं..! मात्र तुम्हारे पास बैठ जाने से मन में ऊष्मीय दबाव बनने लगता है तो उसकी पूर्णता की लालसा हम में नही है..?

" फिर इतना नाटक क्यों..? "

"क्योंकि विवाह पूर्व ऐसा आचरण नैतिक रुप से हमे कमजोर बनायेगा। "

"क्या हम कुछ समय के लिये अलग हो सकते हैं..?" वैभव निराश होते हुये बोला था।

"अलग होने से तुम्हें सेक्स मिल जायेगा..?"

"नही..! पर अकेले में इस पर कुछ मनन अवश्य कर लूंगा।"

"मैं मृत्यु तक तुम्हारी प्रतीक्षा कर लूंगी वैभव,क्योंकि तुममें और तरंग में जमीन आसमान का अन्तर है..तुमने आजतक मेरी उंगली भी पकड़ने का लोभ अनाधिकृत रुप से नही किया है..मन में है पर अनुमति चाहते हो..वहीं तरंग मौका पाते ही हक किया..पीठ पर कुछ टटोलते हुये ऊष्म हो रहा था वह..मैं कोई योगिनी नही हूँ..मेरी भी आंतरिक आवश्यकता है पर इस सुखद अनुभव को प्राप्त करने हेतु स्वयं की ही नजरों में नही गिरना चाहती।"  रेणु विना विचलित हुये बोली थी।

वैभव पार्क से बाहर चले गये थे जबकि रेणु अब भी वही पार्क में फूलों के पौधों में नयी नयी आयी कलियों को दुलरा रही थी।
जाते हुए वैभव को रेणु देर तक देखती  रही दूर तक उसे एक बार फिर तरंग का छल हँसता हुआ नजर आता रहा ।
 

                    राजेश ओझा
             .      मोकलपुर गोण्डा

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