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आजादी के अमृत महोत्सव में हर घर तिरंगा srisahity

अरुण दिव्यांस: आजादी के अमृत महोत्सव में
                  हर घर तिरंगा
           शीर्षकः आजाद दीपक 
जल रहे जो आजाद दीपक ,
आजाद ही उन्हें जलने दो ।
आजादी के अमृत महोत्सव ,
घर घर में आजादी पलने दो ।।
डालते रहो घी इस दीपक में ,
अखण्ड दीप सदा जलता रहे ।
प्रज्वलित प्रकाश आजादी का ,
हर मानव मन में पलता रहे ।।
जलता रहे अखण्ड दीप सदा ,
बूझ न पाए हवा के झोंकों से ।
दिए पूर्वज यह दीप जलाकर ,
सजाकर रखना इन्हें लोकों से ।।
जहाँ आजादी का दीप न जले ,
उसके अंतर्मन के दीप जगा दे ।
अंतर्मन मे जो दोष है उपजा ,
उनके अंतर्मन से सदा भगा दे ।।
रोक देना तूफानी वेगों को भी ,
बुझाने का जो भी करे प्रयास ।
पहचानना होगा भारतवर्ष में 
आज कौन खुश कौन उदास ।।
जिसके मन में खुशी न होगी ,
उसके मन में रूखापन होगा ।
जिसके घर पे तिरंगा न होगा ,
वह आजादी का दुश्मन होगा ।।

 आजादी के अमृत महोत्सव
                हर घर तिरंगा
क्यों छिन रहे हो हमारी नींद ,
पल भर के लिए सो नहीं सकते ।
पूछ ले तू अपने दिल से जरा ,
सामने किसी के रो नहीं सकते ।।
घूम रहे हो रात के अँधियारे में ,
उजाले में तुम दिख नहीं सकते ।
काली रात में तेरे काले ये चेहरे ,
दिन उजाला सीख नहीं सकते ।।
घूम रहे हो तुम गलियों के सहारे ,
कभी भारतीय बन नहीं सकते ।
छुपकर रहोगे सदा ही किसी से ,
सीना तान कभी तन नहीं सकते।।
काट रहे वस्त्र टुकड़ियों में तुम ,,
कटे वस्त्र को तुम सी नहीं सकते ।
नृशंस हत्या करनेवाले जल्लादों ,
तू सोच खुलकर जी नहीं सकते।।
उजाले में आकर हाथ मिलाओ ,
उजाले में रहना सीख यहीं सकते।
हाथ तिरंगा लेकर हर घर तिरंगा ,
लहरा तुम भी कही हो सकते ।।

अरुण दिव्यांश
डुमरी अड्डा ,
छपरा सारण ,
बिहार ।
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