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श्रद्धा रखकर श्रद्धा की हार srisahitya

श्रद्धा रखकर श्रद्धा की हार
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रखी श्रद्धा न मातु-पिता पर,
जिसने तुम्हें समझाया था।
रखी श्रद्धा तु झुठे प्यार पर
जिसने तुम्हें बहकाया था।।

श्रद्धा तु अपने नाम का उचित,
किया कभी उपयोग नहीं।
निच-अधम आफताब तुम्हारे,
रहा कभी भी योग्य नहीं।।

उस पापी ने श्रद्धा तुम्हारे, 
किया श्रद्धा का खुन।
पैतिस टुकड़ा किया है जिसने,
पाए नहीं सकुन।।

अंधी होकर श्रद्धा में उसके,
नहीं सकी पहचान।
हत्या करके श्रद्धा तुम्हारा,
मिटा दिया निशान।।

श्रद्धा तुम्हारे श्रद्धा की देखो,
कैसे हो गई हार।
इन्सानियत पर पड़ी हुई 
है
हैवानियत की मार।।

हत्या करके हत्यारे ने,
छोड़ा नहीं सबूत।
श्रद्धा का उसने मिटा दिया,
देखो कैसे वजूद ।।

कवि--प्रेमशंकर प्रेमी(रियासत पवई)औऱगाबाद
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