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चिंतनजब श्रेष्ठ होने का गुमान होने लगे--ss

चिंतन
जब श्रेष्ठ होने का गुमान होने लगे

           'श्रेष्ठ होना' का अर्थ है किसी क्षेत्र या विषय में औरों से अधिक गुणी, जानकार, ज्ञानी, दक्ष, पारंगत या विशिष्ट होना।                     
         जब कोई किसी भी दृष्टिकोण से या गुण से श्रेष्ठ बन जाता है तब वह सबका प्यारा, चहेता, मित्र और मार्गदर्शक तक बन जाता है और सभी उसका मान सम्मान भी औरों से कहीं ज्यादा करने लगते हैं। एक प्रकार से वह सबका पुरोधा या नायक ही बन जाता है। इसलिए सभी अपने जीवन में किसी न किसी मामले में, क्षेत्र में या विषय में श्रेष्ठ बनना चाहतें हैं और बनना भी चाहिए। क्योंकि यही तो सबकी चाहना होती है, इच्छा होती है कि लोग उसे सबसे श्रेष्ठ मानें और उसका अनुसरण करे।

          हम सब में से कोई भी किसी भी क्षेत्र या विषय में श्रेष्ठ हो सकता है।जैसे साहित्य, संगीत, कला, नृत्य कला, कहानी या कविता लेखन, पढ़ाई करने में, वैज्ञानिक अनुसंधान में, शोधकार्य में, वास्तुकला में, आदि में। इससे यश, कीर्ति में वृद्धि होती है और सब सम्मान भी औरों से अधिक करतें हैं।

    इसलिए सबसे श्रेष्ठ बनने की होड़ में व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक शामिल रहते हैं। जैसे कि लता मंगेशकर संगीत के क्षेत्र में श्रेष्ठ थीं। हाकी के खिलाड़ियों में घ्यान चंद जी श्रेष्ठ थे। भारत संस्कृति और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में श्रेष्ठ माना जाता है और यह कभी विश्व गुरु भी माना जा चुका है।

   यह बहुत अच्छी स्थिति होती है जब तक श्रेष्ठ व्यक्ति या राष्ट्र अपनी श्रेष्ठ रहते हुए भी विनम्र और सबके साथ हिल-मिल कर और परस्पर भाईचारे से रहता है,तब तक लोग उसे श्रेष्ठ मानते भी रहते हैं। किन्त, जब आदमी को या किसी देश को अपनी श्रेष्ठता का गुमान होने लगे, अहंकार होने लगे या फिर अन्य सभी को स्वयं से कमतर समझने लगे तब उसका पतन होना शुरू होने लगता है और धीरे धीरे उसकी जिन विशिष्टता के कारण वो श्रेष्ठ बना है, वे सारी चीजें, गुण, आदि भी उससे दूर होते चले जाते हैं, फिर एक दिन ऐसा भी आ जाता है जब वह पुनः सर्वसाधारण बनकर रह जाता है और उसका पहले जैसा महत्व और सम्मान भी नहीं रह पाता। इसलिए श्रेष्ठ होना अच्छी बात है लेकिन श्रेष्ठता का गुमान होना पतन का कारण।

       उपरोक्त कथन को अधिक स्पष्टता से समझने के लिए कतिपय चीजों की और ध्यान दीजिए:

     यह सृष्टि-सत्य है कि जब मनुष्य को अपने किसी गुण अथवा अवगुण का पता चल जाता है या यह अहसास होने लगता है कि उसमें कोई विशेषता है या कोई विशिष्ट गुण है, बस उसी क्षण से वह गुण या अवगुण उसके पास से दूर होने लगता है। धीरे धीरे उसकी विशिष्टता और श्रेष्ठता उसके पास से जाने, निकलने, हटने लगती है। कहने का अर्थ यों समझना चाहिए -

         जब किसी को यह पता लगता है कि उसमें अमुक अवगुण है तो वह उसे दूर करने की चेष्टा करता है और इससे उसके अवगुण की मात्रा में उत्तरोत्तर कमी आते-आते एक दिन पूर्णतया समाप्त हो जाता है। ठीक इसी प्रकार जब उसे अपने में किसी विशेष गुण होने का अहसास हो जाता है या किसी अन्य द्वारा उसकी किसी विशिष्टता या गुण की प्रशंसा कर दी जाती है तब स्वाभाविक रूप से उसे अपने ऊपर गर्व का अहसास होता है। जो उत्तरोत्तर बढ़ते हुए उस विशिष्टता के प्रति अपनी अन्तिम परिणति में अहंकार का रूप धारण कर लेता है। वह अपने उस विशेष गुण के चलते औरों को अपने से कमतर आंकना आरम्भ कर देता है। बस तभी से उसका वह गुण विशेष उससे दूर चला जाता है और रह जाता है  मात्र उसका गर्व, अहंकार और आडम्बर।

      यही स्थिति आज हम सब की बन चुकी है। हमें गर्व हो गया है -

1. भारतवर्ष जैसे देश में पैदा होने का।
2. विश्व गुरु होने का।
3. सबसे पुरानी व समृद्ध संस्कृति एवं सभ्यता वाला देश होने का और उसके वासी होने का।
4. धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने का।
5. सर्व धर्म समभाव मानकर चलने का।
6. अपनी देशभक्ति का।
7. राम-रहीम, गंगा-जमुना, कृष्ण, गुरुनानक, बुद्ध आदि का देश होने का।
8. सत्य और अहिंसा के पुजारी होने का।
9. सबके साथ मिलकर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने का।
10. अपनी विरासत का।
11. अपनी आध्यात्मिकता का।
12.अपने संस्कारों का।
13. अपनी क्षमाशीलता का।
14. अपनी सहनशीलता का।
15. अपने वसुधैव कुटुम्बकम का।
16. अपनी विविधताओं में एकता का
17. अपनी सर्वे भवन्तु सुखिन: की भावना का।
18. अल्पसंख्यकों द्वारा बहुसंख्यकों के साथ सहयोग करने का
19. अल्पसंख्यकों द्वारा बहुसंख्यकों का हितैषी होने का।
20. विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र और संविधान वाला देश होने का।
21. अपने सबसे सफल प्रजातांत्रिक देश होने का।
22. जहां की सरजमीं पर पले-बढ़े, आनन्द लुटा वहां के लिए थोड़ा कष्ट और परिश्रम करके जीवनभर अपने आपको देश का परम भक्त मनवाते रहने का तथा अपनी आगामी नस्ल को बिना कुछ किए सबकुछ उपलब्ध शान ओ शौकत को उनका जन्मसिद्ध अधिकार बताते रहने का चाहे वो वर्तमान में कितने ही भ्रष्ट व गद्दार हों।
23. राम और तथा कृष्ण जैसे आदर्श पुरुषों की जन्मस्थली और कर्मस्थली होने का।
24. भूतकाल में अपने तर्कों-कुतर्कों  द्वारा विश्व को निरुत्तर कर अपना लोहा मनवा लेने का।
25. शत्रु को पराजित कर पुनः अपने ऊपर आक्रमण करने का अवसर प्रदान करने का।
26. अपनी छिनी गई वस्तु को परिश्रम पूर्वक प्राप्त करने के पश्चात् मूर्खतापूर्ण तरीके से पुनः गवां देने और उसे अपनी उदारता बताकर स्वयं को महिमामण्डित करते रहने का।
27. दूसरों को उपदेश देना परन्तु स्वयं के आचरण में न लाकर भी विश्वगुरु तक की उपाधि अपने ही हाथों ले लेने का 
28. नारियों की पूजा करने आदि का झूठा दंभ भरने का।

     ......और आज हम प्रत्यक्ष खुली आंखों देख रहें हैं कि हमारे ऊपर वर्णित गुण किस प्रकार एक-एक करके हमारा साथ छोड़ चुके हैं और जो कुछ बचे हैं वो भी छोड़ रहें हैं।

    उपरोक्त गुणों के अलावा हमें और भी बहुत सी बातों का गुमान रहता है।

       अतः यही समय है हमारे चेतने, सुधरने का, न कि इतराने और इठलाने का। अन्यथा जो किंचित मात्र सुअवसर बचा है हमारे पास,  वह भी बीत जाएगा और हमारे दामन पूरे रित जाएंगे। फिर -

      "कुछ बात है ऐसी कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ....." एक गीत मात्र बनकर रह जाएगा जबकि हस्ती का नामोनिशान भी नहीं बच पाएगा।

बजरंग लाल केजड़ीवाल 'संतुष्ट'
तिनसुकिया, असम

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