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ये पुरुष भी न-ss

समस्त पुरुषों को अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं..!!!

ये पुरुष भी न

सुबह से लेकर रात तक
चुप्पी से लेकर बात तक
मन से लेकर गात तक
घर से लेकर हाट तक
जागने से लेकर खाट तक
जिम्मेदारियों के अहसास से भरे होते हैं,
ये पुरुष भी न... पता नहीं किस मिट्टी के बने होते हैं ..!!!

शब्दों का कम प्रयोग करते हैं
पर हर कार्य में सहयोग करते हैं 
चेहरे से पढ़ लेते हैं मन के भाव
मन की आंखों का उपयोग करते हैं।
कभी  झुंझलाते हैं , कभी चिढ़ते हैं 
कभी बच्चों सा हठ योग करते हैं
किंतु फिर अगले ही पल
मुस्कान की चादर ओढ़ लेते हैं
ये पुरुष भी न... पता नहीं किस मिट्टी के बने होते हैं ..!!!

माना कि आंसू इनकी आंख से बहते नहीं 
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि 
जज्बात इन के दिल में रहते नहीं। 
बाबूजी की टूटी ऐनक और मां की फटी साड़ी से लेकर मुन्नी के हर कौतुक का ये जवाब रखते हैं 
नींद में भी अपनी आमदनी की 
पाई पाई का हिसाब रखते हैं ।
कल के सुनहरे भविष्य के सपने आंखों में लिए सोते हैं।
ये पुरुष भी न... पता नहीं किस मिट्टी के बने होते हैं ..!!!

बेटा भाई पिता पति का किरदार बखूबी ये निभाते हैं 
अपनों की भलाई करते करते अपनों से ही हार जाते हैं 
फौलादी सीने के पीछे दिल इनका भी धड़कता है 
ख्वाहिशों को पूरी करने को रह-रहकर मचलता है 
लेकिन 
मकान के कर्जे की किस्त और 
मुन्नी के स्कूल की फीस का खर्च 
सिर पर तलवार की तरह लटकता है ।
अपनी इच्छाओं की बलि देने की कतार में 
ये सबसे पहले खड़े होते हैं ।
ये पुरुष भी न... पता नहीं किस मिट्टी के बने होते हैं ..!!!

प्यार करने का इनका अंदाज़ सबसे निराला है 
जुबां पर सख्त लहज़ा, 
लेकिन नैनों में प्रेम की पूरी मधुशाला है। 
हमारी सबसे ज्यादा फिक्र ये करते हैं 
लेकिन 
जिक्र करने से हमेशा ही ये मुकरते  हैं ।
ऊपर से सख्त और रूखे लेकिन मन के कोमल होते हैं 
बिटिया की विदाई पर सबसे ज्यादा ये ही रोते हैं ।
ये पुरुष भी न... पता नहीं किस मिट्टी के बने होते हैं ..!!!

सच तो यह है कि 
सारी दुनिया में पुरुष जैसा कोई व्यक्तित्व नहीं 
और 
हम चाहे कितनी भी प्रगति कर लें 
पुरुष बिना हमारा अस्तित्व नहीं..!!!
✍️ संगीता चौबे पंखुड़ी 
अबूहलीफा कुवैत 

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