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परम ज्ञान प्रकाश 

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जय सच्चिदानंद जी














 जय सच्चिदानंद



विवेक वाटिका 
एक राजा शिकार खेलने गया। वहाँ  एक पागल हाथी ने उसका पीछा किया। राजा अपनी जान बचाने को भगा। उसकी नजर एक सूखे कुएं पर पड़ी। कुएँ  की दिवार से लत्तरें लटकी
थीं। जान बचाने के लिए कोई उपाय न देख कर वह उसी कुएँ  में लत्तरों के सहारे लटक गया। ऊपर उसने देखा --दो चूहे ,एक कला और एक उजला ,लत्तर को जड़ से कुतर रहे हैं। अतः  लत्तर टूटने ही वाली है। वह डॉ गया  . उसने सोचा -क्यों नहीं नीचे  ही उतर  जाएँ। तभी उसकी नजर कुएँ  में फन फैलाये सर्प पे पड़ी। राजा के प्राण सूख  गए।  उसकी निगाह ऊपर गयी ,वहाँ  एक हाथी उसकी प्रतीछा में खड़ा  था। बचने का कोई उपाय नहीं दिखाई दे रहा था। 
हम मनुष्यो की यही स्थिति है।  जीव को प्रारब्धरूपी हाथी  खदेड़ रहा है। यह आयु रूपी कुएं की लत्तर को पकडे है।  उस लत्तर को दिन रात रूपी चूहे कुतर रहे हैं। काले सर्प के रूप में मौत नीचे  तैयार है। .
----परमप्रभु --कथामृत



सत्संग सुधा 
----स्वामी तुरिया नंद पुरी जी महाराज 

एक थे जज साहब।जीवन अत्यंत ऐश्वर्यमय  था। एक समय सोते समय उनका नौकर पैर दबा रहा था। शायद उसे नींद आ रही थी, इसीलिए जब जज साहब ने डांट कर पूछा - क्यों बे पैर दबाता या सोता है? अचकचा कर उसने कहा - जी नींद आ रही थी , मगर अब ना सोऊंगा। जज साहब ने उसे कहानी सुनाने के लिए फरमाया। नौकर का नाम बैरागी था। उसने कहा -जी सरकार मैं तो अनपढ़ गवार ठहरा , मुझे क्या कहने आता है ! सरकार तो बहुत पढ़े लिखे हैं ;आप भले ही कुछ कहे, तो अच्छा लगेगा।

 जज साहब बोले- नहीं नहीं कुछ तो सुना, सुनते हैं कहानी। सुनते- सुनते नींद आ जाती है. बार-बार कहने पर बैरागी ने कहना शुरू किया।

 एक था राजा। उसके यहां पर एक काम के लिए अलग-अलग नौकर थे। एक नौकर रनिवास में पलंग पर बिस्तर लगाने के लिए था। वह नित्य ही राजा रानी के सोने के पूर्व बिस्तर को नई-नई चादरों से सजाता, ईत्र से सुगंधित करता। एक दिन पलंग सजा रहा था, दूध जैसी सफेद गुलमोहर चादर बिछाई नीचे लटक रही थी। इत्र खुशबू से बिस्तर को सुगंधित किया। कमरे को भी झार बुहार कर गंध आदि जला कर सुवासित  किया। पलंग के पास खडा  सोचने लगा कि- राजा साहब इस सुंदर बिस्तर पर आराम करेंगे। उन्हें इस पर बड़ा ही आनंद आएगा। वह सोचते सोचते बार-बार सैया  को छूकर देखता। मोहित मन से सोचने लगा -अभी तो राजा साहब के सोने में देर है क्यों ना मैं कुछ देर तक सो कर देखू।  इधर उधर झाँक  कर चादर ओढ़कर पलंग पर लेट रहा।  थका मंदा नौकर सुखदाई मुलायम बिस्तर पर लेटते ही नींद में चला गया। कुछ देर बाद रानी साहिबा पधारी। सोचा राजा साहब सोए हुए हैं ,और वह भी पलंग पर सो गई। 

बाद को राजा साहब शयन गृह पधारे। देखा रानी सोई है।  साथ में दूसरा भी कोई। रानी के दूषित होने की शंका होने लगी। उन्होंने रानी को पहले जगाया। वह उठकर खड़ी हो गई कहने लगी- आप तो अभी आ रहे हैं फिर यह कौन है ? दोनों की बात सुनकर नौकर  जाग उठा। रानी के गुस्से का तो ठिकाना नहीं। नौकर की हालत पूछना ही क्या !काटो तो खून नहीं।  राजा के पैरों पर गिरकर क्षमा मांगने लगा। उसका रोना गिराना देखकर राजा ने कहा माफी तो दी नहीं जा सकती इतने बड़े अपराध की सजा तो जरूर मिलेगी। मगर इस दुष्ट रानी के अधिकार का अपहरण किया है ,इसलिए सजा भी रानी ही मुकर्रर करे। रानी ने कहा कि इस बदतमीज को ५० कोड़े मारे जाएं। 

दूसरे दिन राज सभा के बीच उसे कोडे  मारे जाने लगे। 10-20 कोडे  लगने तक नौकर छटपटाता  रहा. फिर एकाएक बड़े जोर से हंसने लगा. पूरा दरबार उसके व्यवहार से सन्न रह गया. कोडे  लगने की तकलीफ को भूलकर वह हंस क्यों रहा था राजा रानी और अन्य दरबारियों ने उसके हंसने का कारण पूछा तो वह बोला मैं पहली बार दर्द से छटपटाया तो जरूर पर मुझे एकाएक  ख्याल आया कि जिस मेज पर मैं थोड़ी देर अज्ञानवश सो गया।  उस अपराध में मुझे इतने कोड़े लग रहे हैं ,  तब जो उस पर जीवन भर सोता रहा ,उसे भगवान के यहां कितने कोडे  खाने पड़ेंगे ?पर वह शख्स इस बात का कुछ भी ख्याल नहीं करता ,बिल्कुल बेपरवाही से यह विषैला सुख भोगता  जा रहा है। 

 राजा की आंखें खुल गई। उसका सिर शर्म से झुक गया।  पश्चाताप के मारे उसका दिल भर आया कि  हाय इतने भोग विलास में मैं रचता पचता   रहा और अपने अपराध का तनिक भी ख्याल नहीं किया।  मैं भगवान के दरबार में क्या मुँह दिखाऊंगा ? उसे वैराग्य हो गया। कुल सांसारिक भोगो से उपराम हो कर वह  भगवान के भजन में लीन रहने लगा। इस मामूली से धक्के से उसके सुसंस्कार जाग गए और उसके जीवन का ध्येय बदल गया। 

 इस कहानी को सुनकर जज साहब ने भी सोचा हाय !मैंने भी तो अपना अमूल्य जीवन विषय भोगों में ही गवा दिया है।  धिक्कार है ऐसे जीवन को। उन्होंने कहा भाई बैरागी मेरे लिए कंबल जमीन पर बिछा दो। यह कोमल सैय्या मुझे अब काँटो जैसी लग रही है। मैंने बेकार  कामों में सोने सा जीवन बिता दिया। नौकर बार-बार कहने लगा -सरकार यह तो कहानी है कोई सच्ची घटना नहीं है, आप क्यों घबराने लगे।

 जज साहब ने कहा नहीं -नहीं मेरे लिए बिल्कुल सच्ची कहानी है। अब मुझे यह ऐश्वर्य सुख नहीं चाहिए। अब लौ नसानी ,अब न नसैहो।  जज  साहब ने नौकरी छोड़ दी और शेष जीवन भगवत भजन में बिताया। 

वास्तव में मानव जीवन बहुमूल्य है। स्वर्ग के देवता भी मनुष्य शरीर के लिए लालायित रहते हैं। देवताओं का भोग शरीर होता है। उनके द्वारा  स्वर्ग का सुख भोग करते हैं ,पर एक दिन पुण्य छय के बाद उन्हें स्वर्ग से गिरना पड़ता है। पर मनुष्य शरीर के द्वारा साधना करके मोच्छ या परम पद भी प्राप्त किया जा सकता है।  जिसने इस हीरे जैसे शरीर का उपयोग सांसारिक सुख भोग में किया ,वह सचमुच  ही ठगा गया। जीवन को सफल करने के लिए कठिन साधना की जरूरत होती है। 

जय सच्चिदानंद  की जय



अमृत प्रसाद 
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---अनंत विभूषित पूज्य पाद ब्रह्मलीन गुरु महाराज जी द्वारा दिया गया प्रवचन 

स्थान -परम पुरी , तिथि 1970

 गुरु दरबार के अनन्य प्रेमियों ,
                       मन मंदिर तन देश कलंदर, घट ही तीरथ नहावा 
                      एक शब्द मेरे प्राण बसत है, बहुरि जन्म नहीं आवा..

 यह शरीर मंदिर है। इसमें प्राणों का आना-जाना जारी है। उसमें एक ऐसा शब्द है जिसे जान लेने से फिर इस शरीर में अर्थात  जन्म- मरण के चक्कर में नहीं  जाना पड़ेगा। वही 'अजपा ' जाप है। 
तुम सांसो में उसका अभ्यास करो। जब ध्यान का नियम बना लो। सेवा भक्ति उपासना आदि उस अभ्यास में सहायक सिद्ध होंगे।  वे एक दूसरे  के पूरक हो जाएंगे। वाह्य  पदार्थों से तुम्हारे मन को हटाने के लिए सेवा कराई जाती है। 
अभी तो मन असंख्य  जगह में उलझा हुआ है।  वह तुरंत तो अभ्यास में लगेगा नहीं। इसीलिए कहा गया है---

 मोटे बंधन जगत के , गुरु सेवा से काट 
झीने  बंधन मन के, कटे नाम प्रताप। 

सूछ्म  बंधन नाम जप से कटता है। पहले पहल कुटुंब परिवार ,सुत , मित्र ,घर बार की आसक्ति को गुरु की सेवा उपासना से काटा जाता है। उपासना में जैसे-जैसे बढ़ते जाओगे दुनिया की आशक्तियां वैसे-वैसे कम होती जाएगी। इसके बाद तुम्हारी वृति अंदर के अभ्यास में टिकने लगेगी। 


अद्वैत वचनामृत 
----------------------------दयालु परमहंस जी महाराज

 दो आदमी नदी के किनारे पहुंचे।दोनों को पार उतरना था। नाव  नहीं थी। तैरना भी दोनों में से कोई नहीं जानता था। एक ने पीर औलिया मनाने शुरू किए कि '' हे  फलां पीर, मेरी मदद करना !ए फला औलिया ,पार उतारना !और उनका सहारा लेकर दरिया में उतर पड़ा। मगर गोता खाने लगा और डूबने लगा।

दूसरे मर्दे  मैदान बोला कि'' या खुदाया ''और पानी में कूद पड़ा  और  पार उतर गया।
      कहावत है कि जब महाराज रणजीत सिंह जी काबुल की तरफ फौज लेकर के गए तो रास्ते में अटक दरिया पड़ा।  इसकी गहराई ज्यादा और बहाव  तेज है। थोड़ी देर दरिया के किनारे खड़े रहकर घोड़ा  दरिया में डाल दिया और आवाज दी
अटल राज महाराज का, जा में अटक बहाय 
जाके मन में अटक है सोई अटक  रह जाए

 जितने सवारों ने उनके पीछे घोड़े  डाल दिए, सब पार उतर गए। जिन्होंने उनके बाद आगा- पिछा सोचकर पार उतरने की कोशिश की सब डूब गये ।

       अर्थ  है कि जो मानव कभी पोथी टटोलता  है ,कभी गुरु की शरण लेता है, कभी देवी देवता पूजता है, कभी पीर औलिया मानता है ,ऐसा अविश्वासी मझधार में डूबता है। जो एक नाम का सहारा लेकर लंगर डाल देता है वह पार लग जाता है.
   भावार्थ -- दृढ निश्चयी सफलता प्राप्त करते हैं। कमजोर निश्चय वाले ढुलमुल  व्यक्ति नहीं। साधना में भी दृढ़ निश्चय ही सफल हो पाते हैं। दृढ़ निश्चय के अभाव में व्यक्ति जहां का तहां रह जाता है.
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जय सच्चिदानंद जी VIDEO 





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