लेख....

भोजपुरी बनाम_संविधान_की_अनुसूची ....   

-- बिकास चंद्र मिश्र


थोड़ा सा आक्रोश भोजपुरिया समाज में जरूर है कि आखिर सब कुछ से सम्पन्न रहते हुए भी हमारी भोजपुरी को संविधान की अनुसूची में जगह क्यों नहीं मिल पा रही है ? भोजपुरी एक बहुत बड़े भौगोलिक क्षेत्र और जन समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली बोली है। इसको बोलने वालों की संख्या भी बहुत है।  तो आखिर क्या कारण हैं इसकी अपेक्षा का ? भोजपुरी के इतिहास की चर्चा करें तो हीरा डोम, धनीक्षण मिश्र, महेंद्र मिसिर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, मोती बी ए, फिराक गोरखपुरी, कबीर, प्रेमचंद,प्रसाद जिस मिट्टी में पैदा हुए वो इतनी उपेक्षित क्यों है ? क्या इससे बेहतर और नहीं दे सकते हम अपनी भोजपुरी को ? यह गंभीर और विचारणीय प्रश्न है ।
भोजपुरी का दुश्मन कोई और नहीं है वरन् भोजपुरी भाषी क्षेत्र के वो कलाकार हैं जो अपनी रोजी रोटी के चक्कर में इसे अश्लीलता का पर्याय बना दिए हैं । एक तरफ तो हम इसे संविधान की अनुसूची में ले जाने के लिए प्रयासरत हैं वहीं दूसरी तरफ सस्ती लोकप्रियता के लिए हमारे ही साथी इस स्तर तक गिर जा रहें हैं कि श्रोता को भी इस बोली से घृणा हो जा रही है । जब हम आज इस तरह के गीतों और गायकों को सुनते हैं तो लगता है मोती बी ए, धनीक्षण मिश्र, हीरा डोम, महेंद्र मिसिर , हजारी प्रसाद द्विवेदी, भरत व्यास जैसे साहित्य सर्जकों के त्याग की यही कीमत हम अपनी अगली पीढ़ी को दे रहे हैं । क्या इससे बेहतर देने के लिए हमारे पास कुछ नहीं ? 

भोजपुरी के इस गायक को गौर से देखिए । गुड्डू रंगीला नाम है । इनके इस गीत को सुनकर या देखकर कोई भोजपुरी प्रेमी यह दावा कर सकता है क्या भोजपुरी को संविधान की अनुसूची में ले जाने की दरकार है । हम ये कैसे भूल जाए कि हम स्त्रियों को पूजने की परम्परा के लोग है । नारी सशक्तिकरण के इस युग में एक स्त्री के प्रसव पीड़ा का इस तरह से मजाक बनाना , भद्दे ढंग से समाज में परोसना कहां तक उचित है ? गुड्डू रंगीला सरीखे तमाम ऐसे कलाकार हैं जो सस्ती लोकप्रियता और शॉर्ट्स कट्स के चक्कर में अपनी भोजपुरी के साथ कितना भद्दा मजाक कर रहे हैं , नारी के उस प्रसव वेदना को बाजारू वस्तु और मनोरंजन का साधन रूप में परोस रहे हैं , क्यों ? यह प्रश्न भोजपुरी के विकास से जुड़ा हुआ है ।क्यों हम इस तरह से इतना संवेदनहीन हो चुके हैं ।अपनी नैतिकता का बध कर चुके हैं और हमें साहित्य का ज्ञान भी नहीं रहा अब ? आज समाज निर्णय करे कि हमें इन्हे स्वीकारना है गुड्डू रंगीला जैसों को कि भरत व्यास शर्मा, मनोज तिवारी, रवि किशन, कल्पना, मालिनी अवस्थी , शारदा सिन्हा या राकेश उपाध्याय को ?

*विकास_चन्द्र_मिश्र*
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 *उग्र कृत चाकलेट के घासलेटी होने का प्रासंगिक निहितार्थ* 


 यह समकालीन दौर का भी ज्वलंत मुद्दा है । इसके कथ्य में को समलैंगिकता है वह तब से ज्यादा आज प्रासंगिक है। आज हम प्रकृति से विद्रोह करने को आमादा हैं।  यह भी कुछ उसी अभ्यस्त होने के दौर की एक शुरुआत है।  *संकुचित मानसिकता , अपरिपक्व काम, काम - हीनता और स्व के पुरुषार्थ  के प्रति उदासीनता से उपजी इस कामुकता* को आज मनोविज्ञान भी सुलझाने के यत्न में निरन्तर शोध करके थकता सा प्रतीत हो रहा है क्योंकि हर मानव का मनोविज्ञान दूसरे से सर्वथा भिन्न होता है । *यह समलैंगिकता का विमर्श स्त्री ,पुरुष दोनों का सर्वथा भिन्न है ।* अगर कुछ समानता है तो बस संस्कार और संस्कृति से विमुखता है । 

आज समाज में पुरुषों के समान ही *स्त्री विमर्श* के केंद्र में भी एक नए संप्रत्यय ने अपनी खासी पहचान बना ली है *लेस्बियन सेक्स* के नए रूप में । मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब इसके समर्थन में भारतीय किशोरियों द्वारा हाथ में मशाल लेकर जंतर मंतर पर उत्साह के साथ प्रदर्शन किया गया । संदेह इनकी मानसिकता पर कम अपनी भारतीय संस्कृति और इनके संस्कार पर अधिक हुआ । *अप्राकृतिक सम्बन्धों* से अपनी *अतृप्त वासना* को तृप्त करने का उनका यह जरिया निहायत ही अव्यावहारिक और मानसिक अवसाद वाला है । 

भले ही उस समय उनके चाकलेट को घासलेटी साहित्य कहा गया किन्तु आज के संदर्भ में भी वह उससे अधिक प्रासंगिक है। हमे जो लगता इसके पीछे कारण वह यह है कि आज हम पाश्चात्य संस्कृति के इतने मुरीद हो गए हैं कि अपने बच्चों को अपने संस्कार से हम ही विमुख कर दिए हैं । जिससे हमें इस तरह का भविष्य मिल रहा है । एक बड़ी चूक है हमारी यह । *हमने उन्हें संस्कार में जबसे गुडमॉर्निंग और गुडनाईट दिया, मॉम और डैड दिया तबसे ही हमें वृद्धा आश्रम मिला ।* यह कही न कहीं हमारे संस्कारों की ही देन है।  कुल मिलाकर आज इस पश्चिमी बयार से अपनी पीढ़ी को बचाना एक गंभीर चुनौती है । यह *हार्मोन्स डिस बैलेंस* से ज्यादा *संस्कार डीस बैलेंस* की देन है । सच में लगता है बालकृष्ण जी आज भी प्रासंगिक हैं ।

*विकास चन्द्र मिश्र*
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समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज थे प्रेमचन्द.....


प्रेमचन्द व्यक्ति नहीं बल्कि एक युग थे । एक ऐसे युग जिसकी दरकार साहित्य और समाज दोनों को थी । साहित्य जहां मानवीय मूल्य की संभावनाएं तलाश रहा था वही समाज की पीड़ा ओहदे तक नहीं पहुंच पाती थी । ऐसे समय के बीच मुंशी प्रेमचन्द का आगमन होता है और हमारा साहित्य भी ठाकुर का कुआं , मंत्र, पूस की रात,बूढ़ी काकी, पंचपर्मेश्वर, ईदगाह,नामक का दरोगा, बड़े घर की बेटी और कफ़न जैसे विमर्शों से गूंज उठता है । यह कथा साहित्य मानवीय संवेदनाओं से भरे पड़े हैं ।फिर सोजे वतन, गबन , सेवासदन, निर्मला, रंगभूमि, कर्मभूमि और गोदान जैसे उपन्यासों से साहित्य संवृद्घ हो उठता है ।

प्रेमचन्द की दृष्टि सामाजिक विषमताओं और संवेदनशील पक्षों पर जगह जगह पड़ी है।  प्रेमचन्द जीवन के उस चौराहे पर खड़े मिलते हैं जहां से सामाजिक, आर्थिक विषमताओं में समाज बंटा हुआ है ।कहीं न कहीं प्रेमचन्द इस व्यवस्था से आहत थे और इस विषमता पर जगह जगह बरस कर हमें मनुष्य होने के लिए सचेष्ट करते हैं।  उनकी कहानियों में भी ऐसे विमर्शों की भरमार है जो समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है।  जैसे *ठाकुर का कुआं* में तत्कालीन वर्ण व्यवस्था के कुरूप पक्ष को उठाकर समाज को एक गंभीर और ज्वलंत विमर्श देते हैं।  यह और बात है पूर्वाग्रह में उन्हें *सामंतों का मुंशी* घोषित कर दिया गया ।

प्रेमचन्द को प्रेमचंद बनाने में परिस्थितियां भी काफी हद तक जिम्मेदार है।  यह परिस्थितियां ही इन्हे, नवाब राय, धनपत राय, कलम के सिपाही, कलम के मजदूर ,सामंतों के मुंशी बनाती गई । 1880 का दौर देश में काफी विषमताओं का दौर था । एक तरफ से अंग्रेजी हुकूमत तो दूसरी तरह से सामाजिक और आर्थिक विषमता कमजोर वर्ग पर दोहरा प्रहार कर रहा था । विवशता और लाचारी के अलावा उनका हिमायती कोई और नहीं था । ऐसे समय में प्रेमचन्द ने उनकी आवाज बनकर बाहरी और भीतरी गुलामी की तोड़ने का आग्रह किया । उन्होंने कफन में यह बताया की निर्धनता से बड़ी निर्लज्जता और कुछ नहीं । घिसू और माधव की यह संवेदनहीनता तर्क का नहीं संवेदनशीलता का विषय है । ये और बात है उन्हें *सामंतों का मुंशी* फिर भी घोषित कर दिया गया ।

प्रेमचन्द की एक एक पंक्तियों में जीवन का एक रहस्य छिपा हुआ है ।उन्होंने को लिख दिया वह अनादि काल तक के लिए विमर्श का विषय रहेगा । उनकी दृष्टि समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति का हलफनामा है । उनकी रचनाओं में संवेदनशीलता और संवेदनहीनता के मध्य एक गंभीर विमर्श है । *मंत्र* कहानी में डॉक्टर जहां संवेदनहीनता का प्रतिनिधि है वही वह बूढ़ा संवेदनशीलता का । उन्होंने यह बताया की धन दौलत से न कोई धनी होता है और न कोई गरीब । हृदय की विशालता ही उसे स्थापित करती है जो मूल्यों को पोषित करता है अपने भीतर ।

*पूस की एक रात* किसानों की लाचारी और बेबसी को व्यक्ति करती एक कहानी है। जिसने संवेदनशीलता को इतनी परतें है जो किसानों के भाग्य में लिखी हुई रहती हैं । व्यवस्था कोई हो उसे उसी तरह जीना है । *ईदगाह* भी उनकी रचनाधर्मिता का एक अच्छा उदाहरण है । *नमक का दारोगा* एक आदर्श नायक का चरित्र है । *पंच परमेश्वर* सामाजिकता के ताने बाने से बुना एक विमर्श है जिसे प्रेमचन्द ने बड़ी निष्पक्षता से व्यक्त किए हैं ।

प्रेमचंद का संपूर्ण काव्य आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद से यथार्थोन्मुखी आदर्शवाद की तलाश है जिसमें प्रेमचन्द सफल हुए हैं । प्रेमचंद का साहित्य किसानों के जीवन के झंझावातों से गुजरता और उन्हें लिखता हुआ दिखाई देता है । *गोदान* उनके रचनात्मक यात्रा का पड़ाव है । उनके समस्त साहित्यिक अवदानो का सार है । इस उपन्यास में प्रेमचन्द ने होरी, धनिया और गाय के सहारे जो समस्या उठाया है वह कृषक जीवन में आम है । ऐसा लगता है कि गाय की लिप्सा बस होरी और धनिया को नहीं बल्कि प्रेमचन्द को भी उतनी ही है । लगान और जमीदारी प्रथा का जो बिम्ब प्रेमचन्द ने गोदान में प्रस्तुत किया है वह किसानों की नियति है । *जब दूसरों के पांव के तले गर्दन दबी हो टो उन्हें सहलाने में ही भलाई है ।* किन्तु गोबर इसका प्रतिकार करता है । धनिया भी विद्रोह करना चाहती है किन्तु किसानी की चक्की ऐसी होती है जिसमें पीसना ही नियति है । होरी इसमें पिसता है लेकिन खुद को तसल्ली भी देता है कि *मर्द तो साठे पर ही पाठे होते हैं* किन्तु धनिया उस तसल्ली पर भी असहमति जता देती है । *जाकर सीसे में मुंह देखो ।तुम जैसे मर्द साठे पर पाठे नहीं होते, दूध घी अंजन लगाने तक को मिलता नहीं, पाठे होंगे ।*
यह सुनकर होरी जैसे गहरी तंद्रा से जग जाता है और बड़ी बेबसी में कहता है *साठ तक पहुंचने की नौबत न आने पाएगी धनिया! इसके पहले ही चल देंगे ।*

यह होरी के हृदय की वास्तविक वेदना है जिसमें वो जी रहा है।  यह गोदान के पहले पृष्ठ से ही प्रेमचंद ने बताना शुरू किया है। कदाचित उस महान कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का संपूर्ण काव्य विश्व काव्य है.

*विकास चन्द्र मिश्र, गोरखपुर 






सफलता यूँ ही नही मिलती---लेखक: बंशी लाल वर्मा

सफलता सहज नही मिलती 
क्या आप जानते है। दुनिया में  सभी लोग अपने जीवन मे सफल ओर कामयाब होना चाहते है। लेकिन ऐसा होता नही है और कुछ लोग ही अपने जीवन मे सफल और कामयाब हो पाते है। क्या आप ने इस बारे मे कभी सोचा है।दोस्तो आखिर ऐसा क्यूं होता है। 
ऐसा इसलिए होता है कि सोचते या चाहते तो सभी लोग है।अपने जीवन मे सफल या कामयाब होना लेकिन कुछ लोग ही कामयाब हो पाते है।
क्योकि अगर देखा जाए तो कुछ लोग ही कामयाब होने के लिए अपना सव॔श्रेष्ठ देते है। व वह ही कामयाबी को पाने के लिए जी जान से जुनून की हद तक मेहनत करते है। 
वह एक प्लानिगं के साथ शुरू से आखिरी तक एक गोल सेट कर के अपने काय॔ को अंजाम देते है। एक चाट॔ बनाकर अपने जो भी दिनचया है। उसको उसी हिसाब से सैट करते है। व बीच बीच मे वह लोग अपने किये गये कार्यो का मुल्यांकन भी अपने गुरूजनो से करवाते रहते है। व उनके दिशा निर्देशो के अनुसार अपने काम मे लगे रहते है। जिससे उनको आखिर अपने काम मे सफलता मिल ही जाती है। 
जैसै हमने 10 लडको को 300 मीटर की दौड मे दौडने के लिए मैदान मे उतरा तो वह दस के दस दौडने के लिए तैयार तो हो जाएगे लेकिन इनमे से प्रथम सिर्फ वही लडका आएगा जो पहले से नियमित दौड का अभ्यास करता था अपने कोच के समझाये अनुसार दौड की तैयारी करता था 
एक लडका दिव्तीय आएगा व एक लडका तृतीय आऐगा बाकी सब कोई 50 मीटर दौड पाएगा कोई 30 मीटर दौड पाएगा कोई चार कदम ही चलेगा तो कहने का मतलब यह है    कि जीवन मे सफल तो वह ही होगा जो अपने काम को पुरी ईमानदारी से सतत (लगातार) करता रहेगा।
सफल होने वाले लोग कोई अलग काम नही करते 
बस उनके काम करने का तरीका (अंदाज) अलग होता है।

बन्शी लाल वर्मा, झोटवाड़ा जयपुर ,राजस्थान।

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