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हमारे कवि -- डॉ बीना सिंह  (प्रस्तुति --नागेंद्र कुमार दुबे )



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आज हमारे साथ हैं ख्याति प्राप्त लेखिका डॉ.बीना सिंह. आप का निवास स्थान दुर्ग (छत्तीसगढ़) है

व्यवसायिक तौर पर चिकित्सा सेवा से जुड़ी हैं किंतु सामाजिक कार्यों में आपकी  दिलचस्पी प्रशंसनीय है. आप वृद्धाश्रम,  अनाथ आश्रम में निशुल्क सेवा देती हैं.
 
कहानी,  लघुकथा, गीत, गजल, कविता लेखन के साथ-साथ मंचीय प्रस्तुतीकरण का आपका अंदाज आपको अद्वितीय बनाता है.  

लोगों से मिलना जुलना भाईचारा रखना आपका सामान्य स्वभाव है. जो आपसे मिलता है आपका हो जाता है. 


आपके साहित्य अवदानों के लिए आपको राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय मंच पर सम्मानित किया गया है. 

दूरदर्शन एवं निजी चैनलों के कार्यक्रमों में आपकी उपस्थिति सामान्य रूप से होती रहती है. साहित्यिक मंच आपकी उपस्थिति मात्र से गौरवान्वित होते हैं.

✍️डॉ वीणा सिंह द्वारा रचित कविता:


शीर्षक- ''मां''
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मां तेरा साथ है तो सुखद  कहानी  है
मां तेरा साथ है तो जीवन में रवानी है
मां तेरा स्पर्श  कराता याद रूहानी है
ईश्वर को देखा नहीं पर मां तू ही मेरी
भगवान गॉड  अल्लाह की निशानी है

मां मेरे आशाओं पर उसके चमकती बूंदे हैं
मां छन छन जाग रही और हम आंखें मूंदे हैं
अंतर्मन से जो गाया जाए मां वह गीत सुहानी है
मां तेरा साथ है तो सुखद कहानी है

मां करुणा दया के असीमित सिंधु है
मां मेरी पहचान है उनके कोख से उपजा एक बिंदु है
मां सहज सरल सुंदर है मां से ही मुझको प्रीत लगानी है
मां तेरा साथ है तो सुखद कहानी है

मां ईश्वर से प्रदत अनुपम उपहार है
मां पुण्य धरा गगन और सारा का सारा संसार है
मां के चरणों में है चारों धाम यही सब की जुबानी है
मां तेरा साथ है तो सुखद कहानी है

मां शक्कर मक्खन घी गुड़ रोटी और दाल मखानी है
भूख में एक रोटी और खिलाती जैसे वह आगम जानी है
मां रखती नियत साफ नजरें उसकी बर्दानी है
मां तेरा साथ है तो सुखद कहानी है

मां ने अपने लहू से सोच कर मेरे काया का निर्माण किया
महामृत्यु से युद्ध जीतकर हमें जीवन का वरदान दिया
मां के दूध और आंचल के छांव में देवताओं ने भी हार मानी है
मां तेरा साथ है तो सुखद कहानी है

मां तेरा साथ है तो सुखद कहानी है
मां तेरा साथ है तो जीवन में रवानी है

- डॉ बीना सिंह, दुर्ग (छत्तीसगढ़)


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संकलन: नागेंद्र कुमार दुबे (संयोजक )
             साहित्यकुंज, औरंगाबाद (बिहार)

हमारे कवि....(प्रस्तुति---.  नागेंद्र कुमार दुबे )


साहित्य कुंज के कवि-5
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साहित्य कुंज के कवि श्रृंखला की पांचवी कड़ी में आज हमारे साथ हैं डॉक्टर हेरंब  कुमार मिश्र "हरीश". 

आप बिहार राज्य के औरंगाबाद जिले के चंदा गांव के निवासी हैं. 

आप हिंदी के एक लोकप्रिय शिक्षक हैं. आप हिंदी विषय में स्नातकोत्तर स्वर्ण पदक लब्ध रहे हैं. पी-एच डी उपाधि के क्रम में ''रामचरितमानस की फलश्रुति मीमांसा'' आपका शोध विषय रहा है.

शिक्षण कार्य के साथ-साथ आप साहित्य रचना में संलीन रहते हैं. आपकी अनेकों कृतियां पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी  हैं. संप्रति आप एक राजकीय विद्यालय में शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं. 

एक  मंच उद्घोषक के रुप में भी आपकी काफी ख्याति है. जिले के राजकीय कार्यक्रमों से लेकर अखिल भारतीय साहित्यिक सम्मेलनों के मंचों पर एक उद्घोषक के रूप में आप सुशोभित होते हैं.

आइए डॉ. हेरंब कुमार मिश्र हरीश जी की रचनाओं को देखें:


(1)भोक्ता
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हे प्रभो!
दैवी आपदा के रुप में
तूने लाखों को लिया
अपनी आगोश में।
सोचना तो चाहिए था 
सारे लोग सधे थे
भक्ति के जोश में।
पर शायद तूने 
आगाह कर दिया कि
क्रियमान तो है ही
संचित और प्रारब्ध का भी
महत्त्व मानना चाहिए।
पीढ़ी दर पीढ़ी को
फलत्त्व जानना चाहिए।।
(डॉ हेरम्ब )

(2) चितवन
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लाली लाली चुनरी पहिरी लाली धनियाँ,
से लपटेली ललकी पटोर।
कुच कुच कारी कारी करिए कजरिया से,
कते नीक नयना के कोर।।
कारे कारे बलखाले नागिन की केसिया से,
भुईँया छुए लामे लामे छोर।
प्यारे प्यारे पिया परदेसी के असारे जीमे,
सहजेली सेजिया मरोर।।
फर फर फहरेली फगुनी अँचरवा से,
हिया हुलसावे हलरावै बलजोर।
मह मह महकेली मस्त रे गुंजरिया से,
चितवन बाँकी चितचोर।।
(डॉ हेरम्ब )

संकलन: 
-नागेंद्र कुमार दुबे (संयोजक)
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सहित्यकुंज के कवि....(प्रस्तुति---.  नागेंद्र कुमार दुबे )


साहित्य कुंज के कवि श्रंखला में आज हैं हमारे साथ श्री सीमेंट के जीएम ज्ञानेंद्र मोहन खरे साहब. इन्होंने यांत्रिक इंजीनियरिंग में पढ़ाई किया है. वर्तमान में श्री सीमेंट औरंगाबाद के  यूनिट इंचार्ज है. श्रीमान अपने बारे में बताते हैं कि:-

"ज्ञानेंद्र   मोहन  खरे , है   नाम   मेरा
यांत्रिक इंजीनियरिंग का है काम मेरा
मेरे लिए साहित्य सृजन  है - 'साधना'
जीवन के  यथार्थ, को है मुझे उभारना

जिंदगी सार्थक बनाने की , मुझे है  ललक
सूत्रधार बनूँ युग का, ऐसी  मन मे  कसक

ईश्वर पर है असीम, श्रद्धा  और   विश्वास
आशीर्वाद देंगे मुझे, पूरी करेंगे मेरी आस"

आइए ..... हम इनका स्वागत करें🙏🙏

आप की एक रचना:

शीर्षक: महिमा व्हाट्सएप की
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वाह रे व्हाट्सएप वाह से व्हाट्सएप
अजब गजब तेरे रंग रूप.....

नित नए यार दोस्त बनाता,
उंगलियों के सदुपयोग कराता।
सन्देश भेजने की ललक जगाता, 
मनोरंजक वीडियो डाउनलोड कराता।

संदेशे आते है, संदेशे जाते है।
कभी गाने सुनाते है,
कभी चलचित्र दिखाते है।
वाकई रंगमय हुई जिंदगी,
आनन्द की अतिरेक अनुभूति।

वाह रे व्हाट्सएप वाह से व्हाट्सएप
अजब गजब तेरे रंग रूप.....

अब तो बातचीत भी हुई आसान,
वीडियो कॉल करते इंसान।
बच्चे, बूढ़े, जवान हुए मस्त,
व्हाट्सएप रखता सबको व्यस्त।

समय कम पड़ रहा है इंसान को,
नींद सोना भी हुआ दूभर।
चमक कर उठ जाते है रात में,
नोटिफिकेशन की आवाज सुनकर।

वाह रे व्हाट्सएप वाह से व्हाट्सएप
अजब गजब तेरे रंग रूप.....

बच्चों की आंखों पर चढ़ता चश्मा,
महिलाओं में बढ़ती कृत्रिमता।
परेशान है सेल्फी खींच के तस्वीरें भेजने में,
हैरान है पर्याप्त प्रशंसा न मिलने से।

व्हाट्सएप की पड़ गई है लत,
न देखने से लोग होते असहज।
समावेश हो रहे है दोहरे माप दण्ड,
दिखावे का बढ़ता प्रचलन।

वाह रे व्हाट्सएप वाह से व्हाट्सएप
अजब गजब तेरे रंग रूप.....

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साहित्य कुंज के कवि ---( प्रस्तुति --नागेंद्र कुमार दुबे )


सुनील दत्त मिश्रा
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आइए,  मिलते हैं श्री सुनील दत्त मिश्र जी से जो आज साहित्य कुंज के कवि- 4 में हमारे साथ हैं. मिश्र जी में कई गुणों का  मिश्रण है,  यथा - लेखन, अभिनय और  मंचीय काव्य पाठ इत्यादि. इनमें ग़जब  वर्णन संप्रेषण की क्षमता है. आप छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं. फिल्मों एवं कथा साहित्य में योगदान के लिए ''छत्तीसगढ़ रत्न सम्मान'' राज्य शासन द्वारा आपको प्राप्त हुआ है.

सुनील दत्त मिश्रा जी की एक रचना: 

                         ग़ज़ल 
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जल्दी से नहीं आता हूं ,इतवार की तरह
गुम रहता हूं हर रोज मै, बुधवार की तरह

क्यों पूछते हो रोज मैं, कहां गया हूं अब
औरदौड़ता रहता हूं, घुड़सवार की तरह

हर रोज इबारत की कमी, है यहां पर क्या
मैं जब भी पढ़ा जाता हूं ,अखबार की तरह

मेरा नहीं तेरा नहीं ,तो मोल 
किसका है
खुलता नहीं हूं आजकल, बाजार की तरह

जर्दा तंबाकू इत्र है ,संदूकची में बंद
फिर भी मैं बोलता हूं एक  जरदार की तरह

मुझसे फरेबी बातें कभी हो नहीं सकती
समझो ना मुझको गलत तुम
बेकार की तरह

मैं जान हथेली पर ,अपनी ले के चलता हूं
तुम मुझको लग रहे ,अभी हथियार की तरह

मैं दर्द की बातों को ,ग़ज़ल में लिखूं कैसे
सब मुझको देखते हैं ,एक खुद्दार की तरह

बाजार मुस्तफा है, खरीदार है खुदा
मेरा भी कुछ तो मोल है, दीनार की तरह

मैं हीर की कनी सा दमदमा गया तो क्या
मेरी चमक को देख लो अंगार की तरह
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सुनील दत्त मिश्रा,
फिल्म अभिनेता एवं लेखक 
बिलासपुर छत्तीसगढ़